शुक्रवार, 18 सितंबर 2009

नवगीत: लोकतंत्र के शहंशाह की जय...

नवगीत:

लोकतंत्र के
शहंशाह की जय...
*
राजे-प्यादे
कभी हुए थे.
निज सुख में
नित लीन मुए थे.
करवट बदले समय
मिटे सब-
तनिक नहीं संशय.
कोपतंत्र के
शहंशाह की जय....
*
महाकाल ने
करवट बदली.
गायब असली,
आये नकली.
सिक्के खरे
नहीं हैं बाकि-
खोटे हैं निर्भय.
लोभतंत्र के
शहंशाह की जय...
*
जन-मत कुचल
माँगते जन-मत.
मन-मथ,तन-मथ
नाचें मन्मथ.
लोभ, हवस,
स्वार्थ-सुख हावी
करुनाकर निर्दय.
शोकतंत्र के
शहंशाह की जय....

******

सोमवार, 14 सितंबर 2009

नवगीत: अपना हर पल है हिन्दीमय --संजीव 'सलिल'

नवगीत:

संजीव 'सलिल'

अपना हर पल
है हिन्दीमय
एक दिवस
क्या खाक मनाएँ?

बोलें-लिखें
नित्य अंग्रेजी
जो वे
एक दिवस जय गाएँ...

निज भाषा को
कहते पिछडी.
पर भाषा
उन्नत बतलाते.

घरवाली से
आँख फेरकर
देख पडोसन को
ललचाते.

ऐसों की
जमात में बोलो,
हम कैसे
शामिल हो जाएँ?...

हिंदी है
दासों की बोली,
अंग्रेजी शासक
की भाषा.

जिसकी ऐसी
गलत सोच है,
उससे क्या
पालें हम आशा?

इन जयचंदों
की खातिर
हिंदीसुत
पृथ्वीराज बन जाएँ...

ध्वनिविज्ञान-
नियम हिंदी के
शब्द-शब्द में
माने जाते.

कुछ लिख,
कुछ का कुछ पढने की
रीत न हम
हिंदी में पाते.

वैज्ञानिक लिपि,
उच्चारण भी
शब्द-अर्थ में
साम्य बताएँ...

अलंकार,
रस, छंद बिम्ब,
शक्तियाँ शब्द की
बिम्ब अनूठे.

नहीं किसी
भाषा में मिलते,
दावे करलें
चाहे झूठे.

देश-विदेशों में
हिन्दीभाषी
दिन-प्रतिदिन
बढ़ते जाएँ...

अन्तरिक्ष में
संप्रेषण की
भाषा हिंदी
सबसे उत्तम.

सूक्ष्म और
विस्तृत वर्णन में
हिंदी है
सर्वाधिक
सक्षम.

हिंदी भावी
जग-वाणी है
निज आत्मा में
'सलिल' बसाएँ...

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-दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम

शनिवार, 29 अगस्त 2009

गीत: दिव्य सूर्य रश्मियाँ -सन्जीव 'सलिल'

दिव्य सूर्य-रश्मियाँ,
भव्य भाव भूमियाँ...

श्वास-आस दायिका,
रास-लास नायिका।
त्रास-ह्रास हरंकर-
उजास वर प्रदायिका।
ज्ञान-ध्यान-मानमय
सहज-सृजित सृष्टियाँ...

कमलनयन ध्यायिका,
विशेष शेष शायिका।
अनंत-दिग्दिगंत की,
अनादि आख्ययिका।
मूर्तिमंत नव बसंत
कंत श्याम तामिया...

गीत-ग़ज़ल गायिका,
नवल नाद नायिका।
श्रवण-मनन-सृजन-कथन,
व्यक्त व्याख्यायिका।
श्रम-लगन-समर्पण की-
चाह-राह दामिया...

सतत-प्रगत धाविका,
विगतागत वाहिका।
संग अपार 'सलिल'-धार
आर-पार नाविका।
रीत-गीत-प्रीतपरक
दृष्टादृष्ट दृष्टियाँ...

प्रणय-गंध सात्विका
विलय-बंध प्राप्तिका।
श्वास-रंध्र आपूरित-
मलयानिल आप्तिका।
संचारित-सुविचारित
आचारित ऊर्मियाँ

*****

बुधवार, 26 अगस्त 2009

नव गीत: जिनको कीमत नहीं समय की -आचार्य संजीव 'सलिल'

नव गीत:

आचार्य संजीव 'सलिल'

जिनको कीमत नहीं
समय की
वे न सफलता
कभी वरेंगे...

*

समय न थमता,
समय न झुकता.
समय न अड़ता,
समय न रुकता.
जो न समय की
कीमत जाने,
समय नहीं
उसको पहचाने.
समय दिखाए
आँख तनिक तो-
ताज- तख्त भी
नहीं बचेंगे.....

*

समय सत्य है,
समय नित्य है.
समय तथ्य है,
समय कृत्य है.
साथ समय के
दिनकर उगता.
साथ समय के
शशि भी ढलता.
हो विपरीत समय
जब उनका-
राहु-केतु बन
ग्रहण डसेंगे.....

*

समय गिराता,
समय उठाता.
समय चिढाता,
समय मनाता.
दुर्योधन-धृतराष्ट्र
समय है.
जसुदा राधा कृष्ण
समय है.
शूल-फूल भी,
गगन-धूल भी
'सलिल' समय को
नमन करेंगे...

***********

शनिवार, 22 अगस्त 2009

गीत: फैलाकर सुगंध मुस्काती पंखुडियाँ

फैलाकर सुगंध
मुस्काती पखुडियाँ,
बरस रहीं या
खोज रहीं हैं
अलगनियां?...

वाचक हैं
ये सद्भावों की,
पढ़कर कथा
अभावों की भी,
लोकतंत्र में
नहीं हो सकीं
हैं ये वंचक
नेताओं सी।
आशाओं की
अभिभावक
नन्ही-मुनियाँ...

मोहक क्षणजीवी
सपने सी,
रूप बदलती हैं
अपने सी।
छोड़ नीद
खो गईं अकेली,
संकट में
मोहक सपने सी।
निर्मम-निर्मोही
श्रावक हैं
या बनिया?...

हर अंजुरी को
महका देंगी,
गुल-गुलशन को
बहका देंगी,
लुक-छिपकर,
काना-फूसी कर,
पर घर में
ताके-झाँकेगी।
सलिल धार सम
देख रहीं हैं
जग-दुनिया...
*****

शुक्रवार, 21 अगस्त 2009

गीत: कलम गीत की फसलें बोती

कलम गीत की
फसलें बोती...

शब्द सिपाही का
संबल बन,
नेह नर्मदा
या चम्बल बन,
सलिल तरंगें
अग-जग धोतीं...

परम्परा पिंजरे

में सिसके,
तोड़-छोड़
जाने में हिचके,
सहे पीर पर
धीर न खोती...

मन कोमल पर
तन कठोर है,
सांझ सुरमई
विमल भोर है।
स्वप्न सीप में,
सृजती मोती...

कभी खास है,
कभी आम है।
नाम अनेकों
पर अनाम है।
अरमानों की
मुखर संगोती...

फूल-शूल
पाषाण-धूल को।
शिखर-गगन को,
भूमि-मूल को
चुप अपने
कन्धों पर ढोती...

*****

गीत: अपनेपन का अर्पित...

गीत
अपनेपन का अर्पित,
अपनों को मान-पान...

गिरते हम, उठते हम।
रुकते हम, चलते हम।
बाधा से तनिक नहीं
डरते हम। थमते हम.
पैर जमा धरती
पर- छू लेंगे आसमान...

हार नहीं मानेंगे
तम् से रार ठानेंगे।
अक्षौहिणी तुम ले लो,
मात्र कृष्ण मांगेंगे।
पाञ्चजन्य फूंकेंगे,
होंगे हम भासमान...

कर्म-कथा कहते हैं,
मर्म-व्यथा सुनते हैं।
पर्वत के पत्थर से-
रेवा सम बहते हैं।
लहर-लहर, भंवर-भंवर
ऊगेंगे शत विहान...

दस दिश में गूंजेंगे,
नए मूल्य पूजेंगे।
संकट के समाधान
युक्ति लगा बूझेंगे।
मेहनती-प्रयासी ही
भाई-बंधु, खानदान...

ऊषा की लाली हम,
दोपहरी प्याली हम।
संध्या की मुसकाहट,
निशा नवल काली हम।
दस दिश में गूंजेंगे-
सरगम-सुर, ताल-तान...

मन्दिर में शंख-नाद
मस्जिद में हम अजान।
कंकर हम, शंकर हम,
विधि-हरि-हर अक्षर हम।
अजर-अमर, अटल-अगम।
कदमों के हम निशान...

शेष नाग फुफकारें।
तूफां बन हुंकारें।
मधुवन के मधुकर हम,
कलियों पर गुन्जारें।
अमिय-गरल हैं हमको-
सत्य कहें प्रिय सामान...

आ जाओ, लगो गले।
मिल पायें भले गले।
दगा दगा को देन हम-
हर विपदा हाथ मले-
हृदयों के कमल खिले
मन का मन करे मान...
*****

रविवार, 16 अगस्त 2009

नवगीत: मगरमचछ सरपंच... आचार्य संजीव् 'सलिल'

गीत

मगरमचछ सरपंच
मछलियाँ घेरे में
फंसे कबूतर आज
बाज के फेरे में...

सोनचिरैया विकल
न कोयल कूक रही
हिरनी नाहर देख
न भागी, मूक रही
जुड़े पाप ग्रह सभी
कुण्डली मेरे में...

गोली अमरीकी
बोली अंगरेजी है
ऊपर चढ़ क्यों
तोडी स्वयं नसेनी है?
सन्नाटा छाया
जनतंत्री डेरे में...

हँसिया फसलें
अपने घर में भरता है
घोड़ा-माली
हरी घास ख़ुद चरता है
शोले सुलगे हैं
कपास के डेरे में...

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सोमवार, 10 अगस्त 2009

स्वाधीनता दिवस पर विशेष रचना: हिंदी है. --'सलिल'

स्वाधीनता दिवस पर विशेष रचना:

आचार्य संजीव 'सलिल'

जो कुछ भी इस देश में है, सारा का सारा हिंदी है.

हर हिंदी भारत माँ के माथे की उज्जवल बिंदी है....


मणिपुरी, कथकली, भरतनाट्यम, कुचपुडी, गरबा अपना है.

लेजिम, भंगड़ा, राई, डांडिया हर नूपुर का सपना है.

गंगा, यमुना, कावेरी, नर्मदा, चनाब, सोन, चम्बल,

ब्रम्हपुत्र, झेलम, रावी अठखेली करती हैं प्रति पल.

लहर-लहर जयगान गुंजाये, हिंद में है और हिंदी है.

हर हिंदी भारत माँ के माथे की उज्जवल बिंदी है....


मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, गिरजा सबमें प्रभु एक समान.

प्यार लुटाओ जितना, उतना पाओ औरों से सम्मान.

स्नेह-सलिल में नित्य नहाकर, निर्माणों के दीप जलाकर.

बाधा, संकट, संघर्षों को गले लगाओ नित मुस्काकर.

पवन, वन्हि, जल, थल, नभ पावन, कण-कण तीरथ, हिंदी है.

हर हिंदी भारत माँ के माथे की उज्जवल बिंदी है....


जै-जैवन्ती, भीमपलासी, मालकौंस, ठुमरी, गांधार.

गजल, गीत, कविता, छंदों से छलक रहा है प्यार अपार.

अरावली, सतपुडा, हिमालय, मैकल, विन्ध्य, उत्तुंग शिखर.

ठहरे-ठहरे गाँव हमारे, आपाधापी लिए शहर.

कुटी, महल, अँगना, चौबारा, हर घर-द्वारा हिंदी है.

हर हिंदी भारत माँ के माथे की उज्जवल बिंदी है....


सरसों, मका, बाजरा, चाँवल, गेहूँ, अरहर, मूँग, चना.

झुका किसी का मस्तक नीचे, 'सलिल' किसी का शीश तना.

कीर्तन, प्रेयर, सबद, प्रार्थना, बाईबिल, गीता, ग्रंथ, कुरान.

गौतम, गाँधी, नानक, अकबर, महावीर, शिव, राम महान.

रास कृष्ण का, तांडव शिव का, लास्य-हास्य सब हिंदी है.

हर हिंदी भारत माँ के माथे की उज्जवल बिंदी है....


ट्राम्बे, भाखरा, भेल, भिलाई, हरिकोटा, पोकरण रतन.

आर्यभट्ट, एपल, रोहिणी के पीछे अगणित छिपे जतन.

शिवा, प्रताप, सुभाष, भगत, रैदास कबीरा, मीरा, सूर.

तुलसी. चिश्ती, नामदेव, रामानुज लाये खुदाई नूर.

रमण, रवींद्र, विनोबा, नेहरु, जयप्रकाश भी हिंदी है.

हर हिंदी भारत माँ के माथे की उज्जवल बिंदी है....

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स्वाधीनता दिवस पर विशेष रचना: स्वतंत्र विश्व के स्वतंत्र वासियों को शत नमन. -संजीव 'सलिल'

स्वाधीनता दिवस पर विशेष रचना:

आचार्य संजीव 'सलिल'

स्वतंत्र विश्व के स्वतंत्र वासियों को शत नमन.

स्वतंत्र ही रहे फिजा, स्वतंत्र ही रहे चमन.

स्वतंत्र हों, ये लक्ष्य ले, जो बढे कदम-कदम.

स्वतंत्र नहीं, देख जिनके दिल दुखे, थीं आँख नम.

स्वतंत्र दीप-शिख जलाने जिनने सर कटा दिए.

स्वतंत्रता-प्रकाश पाने खुद के घर जला दिए.

स्वतंत्रता के दीवानों को मौत भी थी जिंदगी.

स्वतंत्रता ही धर्म-कर्म, दीन-ईमां बंदगी.

स्वतंत्र मौत जिंदगी, गुलाम जिंदगी मरण.

स्वतंत्र स्वप्न सत्य हों, गुलाम सत्य विस्मरण.

स्वतंत्र आज हम हैं जिनके त्याग औ' बलिदान से.

स्वतंत्र जी रहे उठाये सर जहां में शान से.

स्वतंत्रता दिवस उन्हें नमन करो, नमन करो.

स्वतंत्रता पे जां लुटा के सार्थक जनम करो.

स्वतंत्रता का अर्थ नहीं आपसी टकराव है.

स्वतंत्र हैं सभी तभी जब आपसी लगाव है.

स्वतंत्र भारती उतारो आज मिल के आरती.

स्वतंत्रता की नर्मदा परम पवित्र तारती.

स्वतंत्र देश-वेश, भाषा-भाव भी पवित्र हैं.

स्वतंत्र मरण ही स्वतंत्र जिंदगी का मंत्र है.

जय जवान! जय किसान!!

जय विज्ञानं! देश महान!!

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स्वाधीनता दिवस पर विशेष आव्हान गीत :टूट जाओ मत झुकना साथी. -संजीव 'सलिल'

आव्हान गीत

आचार्य संजीव 'सलिल'

टूट जाओ मत झुकना साथी.
बीच राह मत रुकना साथी.
एक-एक जुड़ शत-सहस्त्र हो-
थककर कभी न चूकना साथी....

मंजिल अपनी पाना साथी.
राह भूल मत जाना साथी.
राष्ट्र जिंदगी है हम सबकी-
बन इसका दीवाना साथी...

बहुत सहा, मत सहना साथी.
मेहनत अपना गहना साथी.
ऐक्यभाव की नेह-नर्मदा-
बन तरंग संग बहना साथी....

दीपकवत जल जाना साथी.
मरकर जीवन पाना साथी.
युग आया अब करो-मरो का-
गूँजे यही तराना साथी....

सब को साथ उठाना साथी.
कोई नहीं बेगाना साथी.
कंकर-कंकर से शंकर रच-
भू पर स्वर्ग बसाना साथी...

********************

गीत: श्रम के सुमन चढायेंगे

स्वाधीनता दिवस पर विशेष रचना:

श्रम के सुमन चढायेंगे.

आचार्य संजीव 'सलिल'

राष्ट्र देव के श्री चरणों में,
श्रम के सुमन चढायेंगे.
संघर्षों के पथ पग धर,
निर्माणों पर बलि जायेंगे.....

हम से देश, देश से हम हैं.
मेहनत ही अपना परचम है.
मन्दिर, मस्जिद, गिरजा भूलो
एक देव युग-युग से श्रम है.
नेह नर्मदा नित्य नहाकर
जीवन सफल बनायेंगे...

सार-सार को छाँट-छाँटकर,
पाषाणों को काट-काटकर.
अर्जन- अर्चन में सब भागी-
श्रेय सभी लें बाँट-बाँटकर.
समरसता का मूलमंत्र हम
अग-जग में गुंजायेंगे...

माटी से मीनार गढ़ेंगे.
मंजिल तक सब साथ बढ़ेंगे.
बलिदानी-बलिपंथी हैं हम-
एक नहीं शत शीश चढेंगे.
हर कीमत देंगे, लेकिन पग
पीछे नहीं हटायेंगे.....

'मावस में बन दीप जलेंगे.
साथ समय के सदा चलेंगे.
कर्म करेंगे निरासक्त हो,
कभी न अपने दिवस ढलेंगे.
सबसे-सबके लिए-सभी का
ध्येय मार्ग अपनाएंगे....

अधिकारों का तेल डालकर,
कर्तव्यों के दीप बालकर.
रौशन कर दें सारी दुनिया,
''सलिल'' कदम रख हर सम्हालकर.
कर्मयोग के साधक हम सब
कर्मव्रती कहलायेंगे...

**********************

शुक्रवार, 7 अगस्त 2009

गीत: हम गिर-उठकर खड़े हुए हैं

गीत

हम गिर-उठकर

खड़े हुए हैं।

जो न गिरे

वे पड़े हुए हैं...

सूरत-सूरत

सुंदर मूरत,

कहीं न कुछ भी

बिना जरूरत।

पल-प्रति पल

जो जिए बदलकर,

जुड़े टूटकर-

जमे पिघलकर।

जो न महकते

सड़े हुए हैं...

कंकर-कंकर

देखे शंकर।

शिव-शव दोनों

ही प्रलयंकर।

मन्दिर-मन्दिर

बजाते घंटे;

पचा प्रसादी-

पलते पंडे।

तकदीरों से

बड़े हुए हैं...

ये भी, वे भी

दोनों कच्चे,

ख़ुद को बड़ा

समझते बच्चे।

सीख न पाते

किंतु सिखाते,

पुष्प वृक्ष से

झडे हुए हैं...

*****

रविवार, 2 अगस्त 2009

गीत: दीप-वर्तिका सदृश जलेंगे

गीत

> दीपवर्तिका

सदृश जलेंगे


आपद-विपदा


विहँस सहेंगे...


हैं लघु कण



यह सत्य जानते,

पर विराट से

समर ठानते।



पचा न पायें



आप हलाहल,



धार कंठ में-



हम उबारते।

शिवता-सुंदरता

के पथ पर-

सत का कर

गह नित्य बढ़ेंगे...

कहीं न परिमल



हर दल दलदल।

भ्रमर-दंश से



दंशित शतदल।


सलिल-धार


अनवरत प्रवाहित।

शब्द अमरकंटक


से प्रति पल।

लोक नर्मदा

नीति वर्मदा


कार्य शर्मदा


सतत करेंगे...



अजर-अमर हैं

हम अक्षर हैं।

नाद-ताल हैं

सरगम-स्वर हैं।

हम अनादि हैं,

हम अनंत हैं।



सादि-सांत हम



क्षण-भंगुर हैं॥



सच कहते हैं

सब जग सुन ले,

मौत वरेंगे पर न मरेंगे,



*****

शनिवार, 1 अगस्त 2009

गीत: अपने-सपने कर नीलाम

गीत


अपने सपने

कर नीलाम

औरों के कुछ

आयें काम...

तजें अयोध्या

अपने हित की

गहें राह चुप

सबके हित की

लोक हितों की

कैकेयी अनुकूल

न अब हो वाम...

लोक नीति की

रामदुलारी

परित्यक्ता

जनमत की मारी

वैश्वीकरण

रजक मतिहीन

बने- बिगाडे काम...

जनमत-

बेपेंदी का लोटा

सत्य-समझ का

हरदम टोटा

मन न देखता

देख रहा

है 'सलिल' चमकता चाम...

*****