सोमवार, 6 दिसंबर 2021
छंद झूलना, झूलना छंद, नवगीत, मुक्तक, दोहा, लघुकथा, गीत
सोमवार, 17 अगस्त 2015
muktak geet
शुक्रवार, 15 अगस्त 2014
doha geet: kya sachmuch? sanjiv
क्या सचमुच?
संजीव
*
क्या सचमुच स्वाधीन हम?
गहन अंधविश्वास सँग
पाखंडों की रीत
शासन की मनमानियाँ
सहें झुका सर मीत
स्वार्थ भरी नजदीकियाँ
सर्वार्थों की मौत
होते हैं परमार्थ नित
नेता हाथों फ़ौत
संसद में भी कर रहे
जुर्म विहँस संगीन हम
क्या सचमुच स्वाधीन हम?
*
तंत्र लाठियाँ घुमाता
जन खाता है मार
उजियारे की हो रही
अन्धकार से हार
सरहद पर बम फट रहे
सैनिक हैं निरुपाय
रण जीतें तो सियासत
हारे, भूल भुलाय
बाँट रहें हैं रेवड़ी
अंधे तनिक न गम
क्या सचमुच स्वाधीन हम?
*
दूषित पर्यावरण कर
मना रहे आनंद
अनुशासन की चिता पर
गिद्ध-भोज सानंद
दहशतगर्दी देखकर
नतमस्तक कानून
बाज अल्पसंख्यक करें
बहुल हंस का खून
सत्ता की ऑंखें 'सलिल'
स्वार्थों खातिर नम
क्या सचमुच स्वाधीन हम?
*
salil.sanjiv@gmail.com
9425183244
सोमवार, 14 जुलाई 2014
गीतः हम मिले -संजीव
गीतः मनुज से -संजीव
मनुज से...
न आये यहाँ हम बुलाये गये हैं.
तुम्हारे ही हाथों बनाये गये हैं.
ये सच है कि निर्मम हैं, बेजान हैं हम,
कलेजे से तुमको लगाये गये हैं.
नहीं हमने काटा कभी कोई जंगल
तुम्हीं कर रहे थे धरा का अमंगल.
तुमने ही खोदे थे पर्वत और टीले-
तुम्हीं ने किया पाट तालाब दंगल..
तुम्हीं ने बनाये ये कल-कारखाने.
तुम्हीं जुट गये थे भवन निज बनाने.
तुम्हारी हवस का न है अंत लोगों-
छोड़ा न अवसर लगे जब भुनाने..
कोयल की छोड़ो, न कागा को छोड़ा.
कलियों के संग फूल कांटा भी तोड़ा.
तुलसी को तज, कैक्टस शत उगाये-
चुभे आज काँटे हुआ दर्द थोड़ा..
मलिन नेह की नर्मदा तुमने की है.
अहम् के वहम की सुरा तुमने पी है.
न सम्हले अगर तो मिटोगे ये सुन लो-
घुटन, फ़िक्र खुद को तुम्हीं ने तो दी है..
हूँ रचना तुम्हारी, तुम्हें जानती हूँ.
बचाऊँगी तुमको ये हाथ ठानती हूँ.
हो जैसे भी मेरे हो, मेरे रहोगे-
इरादे तुम्हारे मैं पहचानती हूँ..
नियति का इशारा समझना ही होगा.
प्रकृति के मुताबिक ही चलना भी होगा.
मुझे दोष देते हो नादां हो तुम-
गिरे हो तो उठकर सम्हलना भी होगा..
ये कोंक्रीटी जंगल न ज्यादा उगाओ.
धरा-पुत्र थे, फिर धरा-सुत कहाओ..
धरती को सींचो, पुनः वन उगाओ-
'सलिल'-धार संग फिर हँसो-मुस्कुराओ..
नहीं है पराया कोई, सब हैं अपने.
अगर मान पाये, हों साकार सपने.
बिना स्वर्गवासी हुए स्वर्ग पाओ-
न मंगल पे जा, भू का मंगल मनाओ..
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बुधवार, 26 जून 2013
geet: sach hai -- sanjiv
सच है
संजीव 'सलिल'
*
कुछ प्रश्नों का कोई भी औचित्य नहीं होता यह सच है.
फिर भी समय-यक्ष प्रश्नों से प्राण-पांडवी रहा बेधता...
*
ढाई आखर की पोथी से हमने संग-संग पाठ पढ़े हैं.
शंकाओं के चक्रव्यूह भेदे, विश्वासी किले गढ़े है..
मिलन-क्षणों में मन-मंदिर में एक-दूसरे को पाया है.
मुक्त भाव से निजता तजकर, प्रेम-पन्थ को अपनाया है..
ज्यों की त्यों हो कर्म चदरिया मर्म धर्म का इतना जाना-
दूर किया अंतर से अंतर, भुला पावना-देना सच है..
कुछ प्रश्नों का कोई भी औचित्य नहीं होता यह सच है.
फिर भी समय-यक्ष प्रश्नों से प्राण-पांडवी रहा बेधता...
*
तन पाकर तन प्यासा रहता, तन खोकर तन वरे विकलता.
मन पाकर मन हुआ पूर्ण, खो मन को मन में रही अचलता.
जन्म-जन्म का संग न बंधन, अवगुंठन होता आत्मा का.
प्राण-वर्तिकाओं का मिलना ही दर्शन है उस परमात्मा का..
अर्पण और समर्पण का पल द्वैत मिटा अद्वैत वर कहे-
काया-माया छाया लगती मृग-मरीचिका लेकिन सच है
कुछ प्रश्नों का कोई भी औचित्य नहीं होता यह सच है.
फिर भी समय-यक्ष प्रश्नों से प्राण-पांडवी रहा बेधता...
*
तुमसे मिलकर जान सका यह एक-एक का योग एक है.
सृजन एक ने किया एक का बाकी फिर भी रहा एक है..
खुद को खोकर खुद को पाया, बिसरा अपना और पराया.
प्रिय! कैसे तुमको बतलाऊँ, मर-मिटकर नव जीवन पाया..
तुमने कितना चाहा मुझको या मैं कितना तुम्हें चाहता?
नाप माप गिन तौल निरुत्तर है विवेक, मन-अर्पण सच है.
कुछ प्रश्नों का कोई भी औचित्य नहीं होता यह सच है.
फिर भी समय-यक्ष प्रश्नों से प्राण-पांडवी रहा बेधता...
*
रविवार, 5 फ़रवरी 2012
बासंती दोहा गीत... फिर आया ऋतुराज बसंत संजीव 'सलिल'
संजीव 'सलिल'
फिर आया ऋतुराज बसंत,
प्रकृति-पुरुष हिल-मिल खिले
विरह--शीत का अंत....
*
रति-रतिपति ने झूमकर-
किया शाप को दग्ध..
नव-कोशिश की कामिनी
वरे सफलता कंत...
प्रेम-सलिल में डूब..
कसे कसौटी पर गए
अब अविकारी संत...
*
शयन कक्ष में देख चुप-
देख भामिनी-भूप..
नहीं द्वैत में तंत...
*****
गीत: गाँव जी! कहें न शहर लुटेरा... संजीव 'सलिल'
गाँव जी! कहें न शहर लुटेरा...
संजीव 'सलिल'
*
मार समय की सहें मूक हो, कोई न तेरा-मेरा.
पीर, वेदना, तन्हाई निश-दिन करती पग-फेरा..
गाँव जी! कहें न शहर लुटेरा...
*
तुमने वन-पर्वत खोये, मैंने खोया सुख-चैन.
दर्द तुम्हारे दिल में है, मेरे भी भीगे नैन..
लोभ-हवस में झुलसा है, हम दोनों का ही डेरा.
गाँव जी! कहें न शहर लुटेरा...
*
शकुनि सियासत के हाथों हम दोनों हारे दाँव.
हाथ तुम्हारे घायल हैं, मेरे हैं चोटिल पाँव..
जीना दूभर, नेता अफसर व्यापारी ने घेरा.
गाँव जी! कहें न शहर लुटेरा...
*
तुमने चौपालों को खोया, मैंने नुक्कड़ खोये.
पनघट वहाँ सिसकते, गलियाँ यहाँ बिलखकर रोये..
वहाँ अमन का, यहाँ चैन का बाकी नहीं बसेरा.
गाँव जी! कहें न शहर लुटेरा...
*
तुम्हें तरसता देख जुटायी मैंने रोजी-रोटी.
चिपक गया है पेट पीठ से, गिन लो बोटी-बोटी..
खोटी-खोटी सुना रहे क्यों नहीं प्यार से हेरा?
गाँव जी! कहें न शहर लुटेरा...
*
ले विकास का नाम हर तरफ लूट-पाट है जारी.
बैठ शाख पर चला रहा शाखा पर मानव आरी..
सिसके शाम वहाँ, रोता है मेरे यहाँ सवेरा.
गाँव जी! कहें न शहर लुटेरा...
*
शनिवार, 26 नवंबर 2011
गीत: चिंतन कर..... -संजीव 'सलिल'
चिंतन कर.....
संजीव 'सलिल'
*
चिंतन कर, चिंता मत कर मन
उन्मत मत हो आज.
विचार गगन में, डूब समुद में-
जी भर काज-अकाज...
*
जीवन पल्लव, ओस श्वास-तन
पल में होते नष्ट.
संचय-अर्जन काम न आता-
फेटा खुद को कष्ट..
जो पाता वह रहे लुटाता
दोनों हाथ कबीर.
मन का राजा कहलाता है
खाली हाथ फकीर..
साथ चिता तक चिंता उसके
जिसके सिर पर ताज.....
*
काम उठा फण करता नर्तन
डंसे न लेकिन हेय.
माटी सेमिल माटी रचती
माटी, ज्ञेय-अज्ञेय..
चार चरण, कर चार, नयन हों
चार, यही है श्रेय.
विध्न भी आकर बनता है
विधि का विहँस विधेय..
प्यासों का सम्मिलन तृप्तिपति
बनकर कर तू राज.....
*
रमा में अब तक, अब कर
रमानाथ का ध्यान.
दिखे सहचरी सखी, भगिनी,
माता, बेटी मतिमान..
सज न, सजा ना, जो जैसा है
वही करे स्वीकार.
निराकार साकार दिगंबर
निराधार-साधार..
भोग लगा रह स्वाद-गंध निरपेक्ष
न आये लाज.....
*
भोग त्याग को, त्याग भोग को
मणि-कांचन संयोग.
त्याग त्याग को, भोग भोग को
दुर्निवार हो रोग..
राग-विराग एक सिक्के के
पहलू रहें अभिन्न.
साथ एक के,हो न मुदित,
दूजे सँग मत हो खिन्न..
जिसको जिसमें जब मिलना
मिल जाएगा निर्व्याज.....
*
जो लाया वह ले जाना तू
बिसरा शेष-अशेष.
जो जोड़ा वह साथ गया कब
किसके किंचित लेश?
जैसी की तैसी चादर रख
सो जा पैर पसार.
ढाई आखर के जग सारा
पूजे पाँव पखार..
पीले कर दे हाथ मोह के
संग कर माया साज.....
*****
Acharya Sanjiv verma 'Salil'
http://divyanarmada.blogspot.com
http://hindihindi.in
सोमवार, 10 अगस्त 2009
गीत: श्रम के सुमन चढायेंगे
श्रम के सुमन चढायेंगे.
आचार्य संजीव 'सलिल'
राष्ट्र देव के श्री चरणों में,
श्रम के सुमन चढायेंगे.
संघर्षों के पथ पग धर,
निर्माणों पर बलि जायेंगे.....
हम से देश, देश से हम हैं.
मेहनत ही अपना परचम है.
मन्दिर, मस्जिद, गिरजा भूलो
एक देव युग-युग से श्रम है.
नेह नर्मदा नित्य नहाकर
जीवन सफल बनायेंगे...
सार-सार को छाँट-छाँटकर,
पाषाणों को काट-काटकर.
अर्जन- अर्चन में सब भागी-
श्रेय सभी लें बाँट-बाँटकर.
समरसता का मूलमंत्र हम
अग-जग में गुंजायेंगे...
माटी से मीनार गढ़ेंगे.
मंजिल तक सब साथ बढ़ेंगे.
बलिदानी-बलिपंथी हैं हम-
एक नहीं शत शीश चढेंगे.
हर कीमत देंगे, लेकिन पग
पीछे नहीं हटायेंगे.....
'मावस में बन दीप जलेंगे.
साथ समय के सदा चलेंगे.
कर्म करेंगे निरासक्त हो,
कभी न अपने दिवस ढलेंगे.
सबसे-सबके लिए-सभी का
ध्येय मार्ग अपनाएंगे....
अधिकारों का तेल डालकर,
कर्तव्यों के दीप बालकर.
रौशन कर दें सारी दुनिया,
''सलिल'' कदम रख हर सम्हालकर.
कर्मयोग के साधक हम सब
कर्मव्रती कहलायेंगे...
**********************
शुक्रवार, 7 अगस्त 2009
गीत: हम गिर-उठकर खड़े हुए हैं
हम गिर-उठकर
खड़े हुए हैं।
जो न गिरे
वे पड़े हुए हैं...
सूरत-सूरत
सुंदर मूरत,
कहीं न कुछ भी
बिना जरूरत।
पल-प्रति पल
जो जिए बदलकर,
जुड़े टूटकर-
जमे पिघलकर।
जो न महकते
सड़े हुए हैं...
कंकर-कंकर
देखे शंकर।
शिव-शव दोनों
ही प्रलयंकर।
मन्दिर-मन्दिर
बजाते घंटे;
पचा प्रसादी-
पलते पंडे।
तकदीरों से
बड़े हुए हैं...
ये भी, वे भी
दोनों कच्चे,
ख़ुद को बड़ा
समझते बच्चे।
सीख न पाते
किंतु सिखाते,
पुष्प वृक्ष से
झडे हुए हैं...
*****
रविवार, 2 अगस्त 2009
गीत: दीप-वर्तिका सदृश जलेंगे
गीत
> दीपवर्तिका
सदृश जलेंगे
आपद-विपदा
विहँस सहेंगे...
हैं लघु कण
यह सत्य जानते,
पर विराट से
समर ठानते।
पचा न पायें
आप हलाहल,
धार कंठ में-
हम उबारते।
शिवता-सुंदरता
के पथ पर-
सत का कर
गह नित्य बढ़ेंगे...
कहीं न परिमल
हर दल दलदल।
भ्रमर-दंश से
दंशित शतदल।
सलिल-धार
अनवरत प्रवाहित।
शब्द अमरकंटक
से प्रति पल।
लोक नर्मदा
नीति वर्मदा
कार्य शर्मदा
सतत करेंगे...
अजर-अमर हैं
हम अक्षर हैं।
नाद-ताल हैं
सरगम-स्वर हैं।
हम अनादि हैं,
हम अनंत हैं।
सादि-सांत हम
क्षण-भंगुर हैं॥
सच कहते हैं
सब जग सुन ले,
मौत वरेंगे पर न मरेंगे,
*****
शनिवार, 1 अगस्त 2009
गीत: अपने-सपने कर नीलाम
गीत
अपने सपने
कर नीलाम
औरों के कुछ
आयें काम...
तजें अयोध्या
अपने हित की
गहें राह चुप
सबके हित की
लोक हितों की
कैकेयी अनुकूल
न अब हो वाम...
लोक नीति की
रामदुलारी
परित्यक्ता
जनमत की मारी
वैश्वीकरण
रजक मतिहीन
बने- बिगाडे काम...
जनमत-
बेपेंदी का लोटा
सत्य-समझ का
हरदम टोटा
मन न देखता
देख रहा
है 'सलिल' चमकता चाम...
*****
गुरुवार, 30 जुलाई 2009
गीत: चुप न रहें निज स्वर में गायें
गीत
चुप न रहें
निज स्वर में गायें;
निविड़ तिमिर में
दीप जलाएं...
फिक्र नहीं जो
जग ने टोका
बाधा दी
हर पग पर रोका
झेल प्रबल
तूफां का झोंका
मुश्किल में
सब मिल मुस्काएं...
कौन किसी का
सदा सगा है?
अपनेपन ने
छला-ठगा है
झूठा नाता
नेह पगा है
सत्य न यह
पल भर बिसराएँ...
कलकल निर्झेर
बन बहना है
सुख-दुःख सम
चुप रह सहना है
नहीं किसी से
कुछ कहना है
रुकें न
मंजिल पायें...
*****
गुरुवार, 16 जुलाई 2009
गीत: अपना बिम्ब निहारो
अपना बिम्ब निहारो दर्पण मत तोड़ो,
कहता है प्रतिबम्ब की दर्पण मत तोड़ो.
स्वयं सरह न पाओ, मन को बुरा लगे,
तो निज रूप संवारो,दर्पण मत तोड़ो....
शीश उठाकर चलो झुकाओ शीश नहीं.
खुद से बढ़कर और दूसरा ईश नहीं.
तुम्हीं परीक्षार्थी हो तुम्हीं परीक्षक हो,
खुद को खुदा बनाओ, दर्पण मत तोड़ो....
पथ पर पग रख दो तो मंजिल पग चूमे.
चलो झूम कर दिग्-दिगंत-वसुधा झूमे.
आदम हो इंसान बनोगे प्रण कर लो,
पंकिल चरण पखारो, दर्पण मत तोड़ो.
बांटो औरों में जो भी अमृतमय हो.
गरल कंठ में धारण कर लो निर्भय हो.
वरन मौत का कर जो जीवन पायें 'सलिल'.
इवन में उन्हें उतारो, दर्पण मत तोड़ो.
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मंगलवार, 16 जून 2009
गीत: राम कथाएँ - सलिल
सबकी अपनी-अपनी राम कथाएँ हैं।
सबकी अपनी-अपनी करुण-व्यथाएँ हैं....
अपने-अपने पिंजरों में हैं कैद सभी।
और चाहते हैं होना स्वच्छंद सभी।
श्वास-श्वास में कथ्य-कथानक हैं सबमें-
सत्य कहूँ गुन-गुन करते हैं छंद सभी।
अलग-अनूठे शिल्प-बिम्ब-उपमाएँ हैं
सबकी अपनी-अपनी राम कथाएँ हैं.....
अक्षर-अजर-अमर हैं आत्माएँ सबकी।
प्रेरक-प्रबल-अमित हैं इच्छाएँ सबकी।
माँग-पूर्ती, उपभोक्ता-उत्पादन हैं सब।
खन-खन करती मोहें मुद्राएँ सबकी।
रास रचता वह, सब बृज बालाएँ है
सबकी अपनी-अपनी राम कथाएँ हैं.....
जो भी मिलता है क्रेता-विक्रेता है।
किन्तु न कोई नौका अपनी खेता है।
किस्मत शकुनी के पाँसों से सब हारे।
फिर भी सोचा अगला दाँव विजेता है।
मौन हुई माँ, मुखर-चपल वनिताएँ हैं।
सबकी अपनी-अपनी राम कथाएँ हैं.....
करें अर्चना स्वहितों की तन्मय होकर।
वरें वंदना-पथ विधि का मृण्मय होकर।
करें कामना, सफल साधना हो अपनी।
लीन प्रार्थना में होते बेकल होकर।
तृप्ति-अतृप्ति नहीं कुछ, मृग- त्रिश्नाएं हैं।
सबकी अपनी-अपनी राम कथाएँ हैं.....
यह दुनिया मंडी है रिश्तों-नातों की।
दाँव-पेंच, छल-कपट, घात-प्रतिघातों की।
विश्वासों की फसल उगाती कलम सदा।
हर अंकुर में छवि है गिरते पातों की।
कूल, घाट, पुल, लहर, 'सलिल' सरिताएँ हैः।
सबकी अपनी-अपनी राम कथाएँ हैं.....
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