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मंगलवार, 5 मई 2015

muktika (hindi gazal): baat kar -sanjiv

मुक्तिका (हिंदी ग़ज़ल) 

बात कर

बात कर ghazal
Photo by kevin dooley 
निर्जीव को संजीव बनाने की बात कर
हारे हुओं को जंग जिताने की बात कर
‘भू माफ़िये’! भूचाल कहे, ‘मत ज़मीं दबा
जो जोड़ ली है उसको लुटाने की बात कर’
‘आँखें मिलायें’ मौत से कहती है ज़िंदगी
आ मारने के बाद जलाने की बात कर
तूने गिराये हैं मकां बाकी हैं हौंसले
कांटों के बीच फूल खिलाने की बात कर
हे नाथ पशुपति! रूठ मत तू नीलकंठ है
हमसे ज़हर को अमिय बनाने की बात कर
पत्थर से कलेजे में रहे स्नेह ‘सलिल’ भी
आ वेदना से गंगा बहाने की बात कर
नेपाल पालता रहा विश्वास हमेशा
चल इस धरा पे स्वर्ग बसाने की बात कर

muktika (hindi gazal) - sanjiv,

मुक्तिका (हिंदी ग़ज़ल) :

चूक जाओ न

चूक जाओ न ghazal
Photo by Vincepal 
चूक जाओ न, जीत जाने से
कुछ न पाओगे दिल दुखाने से
काश! ख़ामोश हो गये होते
रार बढ़ती रही बढ़ाने से
बावफ़ा थे, न बेवफ़ा होते
बात बनती है, मिल बनाने से
घर की घर में रहे तो बेहतर है
कौन छोड़े हँसी उड़ाने से?
ये सियासत है, गैर से बचना
आज़माओ न आज़माने से
जिसने तुमको चुना नहीं बेबस
आयेगा फिर न वो बुलाने से
घाव कैसा हो, भर ही जाता है
दूरियाँ मिटती हैं भुलाने से

muktika (hindi gazal) - sanjiv

मुक्तिका:

बोलना था जब

बोलना था जब, तभी लब कुछ नहीं बोले
बोलना था जब नहीं, बेबात भी बोले
काग जैसे बोलते हरदम रहे नेता
ग़म यही कोयल सरीखे क्यों नहीं बोले?
परदेस की ध्वजा रहे फ़हरा अगर नादां
निज देश का झंडा उठा हम मिल नहीं बोले
रिश्ते अबोले रिसते रहे बूँद-बूँद कर
प्रवचन सुने चुप सत्य, सुनकर झूठ क्या बोले?
बोलते बाहर रहे घर की सभी बातें
घर में रहे अपनों से अलग कुछ नहीं बोले
सरहद पे कटे शीश या छाती हुई छलनी
माँ की बचाई लाज, लाल चुप नहीं बोले

muktika: aap se aap -sanjiv

मुक्तिका:

आप से आप ही

आप से आप ही ghazal
Photo by DBduo Photography 
आप से आप ही टकरा रहा है
आप ही आप जी घबरा रहा है
धूप ने छाँव से कर दी बगावत
चाँद से सूर्य क्यों घबरा रहा है?
क्यों फ़ना हो रहा विश्वास कहिए?
दुपहरी में अँधेरा छा रहा है
लोक को था भरोसा हाय जिन पर
लोक उनसे ही धोखा खा रहा है
फ़िज़ाओं में घुली है गुनगुनाहट
ख़त्म वनवास होता जा रहा है
हाथ में हाथ लेकर जो चले थे
उन्हीं का हाथ छूटा जा रहा है
बुहारू ले बुहारो आप आँगन
स्वार्थ कचरा बहुत बिखरा रहा है

muktika: chal rahe -sanjiv

मुक्तिका:

चल रहे

चल रहे ghazal
Photo by davebloggs007 
चल रहे पर अचल हम हैं
गीत भी हैं, ग़ज़ल हम हैं
आप चाहें कहें मुक्तक
नकल हम हैं, असल हम हैं
हैं सनातन, चिर पुरातन
सत्य कहते नवल हम हैं
कभी हैं बंजर अहिल्या
कभी बढ़ती फ़सल हम हैं
मन-मलिनता दूर करती
काव्य सलिल धवल हम हैं
जो न सुधरी आज तक वो
आदमी की नसल हम हैं
गिर पड़े तो यह न सोचो
उठ न सकते निर्बल हम हैं
ठान लें तो नियति बदलें
धरा के सुत सबल हम हैं
कह रही है सलिल दुनिया                                                                                                                      बता दो  ‘संजीव’ हम हैं
*

रविवार, 10 जून 2012

मुक्तिका: चूहे करते रोज धमाल... संजीव 'सलिल'

मुक्तिका:
चूहे करते रोज धमाल...
संजीव 'सलिल'
*

*
हुआ रसोई में भूचाल.
चूहे करते रोज धमाल..
*
रोटी करने चली निकाह
हाथ न लेकिन आयी दाल..
*
तसला ले या पकड़ कुदाल.
काम न लेकिन कल पर टाल..

*
औरों की माँ-बहिनें क्यों
बोल तुझे लगती हैं माल?.

*
खून न पानी हो पाये.
चाहे समय उधेड़े खाल..
*
तोड़ न पाये समय जिसे.
उस साँचे में खुद को ढाल..
*
करनी ऐसी रहे 'सलिल'
झुके न औरों सम्मुख भाल..
***
Acharya Sanjiv verma 'Salil'
http://divyanarmada.blogspot.com
http://hindihindi.in

रविवार, 5 फ़रवरी 2012

मुक्तिका: ये न मुमकिन हो सका --संजीव 'सलिल'

मुक्तिका
ये न मुमकिन हो सका
संजीव 'सलिल'
*
आप को अपना बनाऊँ ये न मुमकिन हो सका.
गीत अपने सुर में गाऊँ ये न मुमकिन हो सका..

आपके आने के सपना देखकर अँखियाँ थकीं.
काग बोले काऊँ-काऊँ ये न मुमकिन हो सका..

अपने घर में शेर, जा बाहर हुआ हूँ ढेर मैं.
जीत का छक्का उड़ाऊँ ये न मुमकिन हो सका..

वायदे कर वोट पाये, और कुर्सी भी मिली.
वायदा अपना निभाऊँ ये न मुमकिन हो सका..

बेटियों ने निभाया है फर्ज़ अपना इस तरह.
कर बिदा उनको भुलाऊँ ये न मुमकिन हो सका..

जड़ सभी बीमारियों की एक ही पायी 'सलिल'.
पसीना हँसकर बहाऊँ ये न मुमकिन हो सका..

लिख रहा लेकिन खुशी से 'सलिल' मैं मरहूम हूँ.
देख उनकी झलक पाऊँ ये न मुमकिन हो सका..

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मुक्तिका:
धूप सुबह की
संजीव 'सलिल'
*                                                                                                                     
धूप सुबह की, चाय की प्याली, चश्मा थामे हाथ.
पापाजी अख़बार लिये, नत झुर्रीवाला माथ..
माँ जी ऐ जी, ओ जी कहकर जब देतीं आवाज़.
चेहरे पर मुस्कान लिए दो नयन झाँकते साथ..
पच्चासी की उमर बिना जल करतीं करवा चौथ.
माँ दे अरघ तोड़तीं व्रत, सम्मुख पाकर निज नाथ..
मार समय की चूल्हे सिगड़ी संग गुमे कंदील.
अब न खनकती चूड़ी कोई हँसती कंडे पाथ..
जब थे तब मालूम नहीं था खो होंगे बेचैन.
माँ-पापा बिन 'सलिल' रह गया होकर हाय अनाथ..
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