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मंगलवार, 29 जून 2010

गीत: कहे कहानी, आँख का पानी. संजीव 'सलिल

गीत:
कहे कहानी, आँख का पानी.
संजीव 'सलिल'
*
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*
कहे कहानी, आँख का पानी.
की सो की, मत कर नादानी...
*
बरखा आई, रिमझिम लाई.
नदी नवोढ़ा सी इठलाई..
ताल भरे दादुर टर्राये.
शतदल कमल खिले मन भाये..
वसुधा ओढ़े हरी चुनरिया.
बीरबहूटी बनी गुजरिया..
मेघ-दामिनी आँख मिचोली.
खेलें देखे ऊषा भोली..
संध्या-रजनी सखी सुहानी.
कहे कहानी, आँख का पानी...
*
पाला-कोहरा साथी-संगी.
आये साथ, करें हुडदंगी..
दूल्हा जाड़ा सजा अनूठा.
ठिठुरे रवि सहबाला रूठा..
कुसुम-कली पर झूमे भँवरा.
टेर चिरैया चिड़वा सँवरा..
चूड़ी पायल कंगन खनके.
सुन-गुन पनघट के पग बहके.
जो जी चाहे करे जवानी.
कहे कहानी, आँख का पानी....
*
अमन-चैन सब हुई उड़न छू.
सन-सन, सांय-सांय चलती लू..
लंगड़ा चौसा आम दशहरी
खाएँ ख़ास न करते देरी..
कूलर, ए.सी., परदे खस के.
दिल में बसी याद चुप कसके..
बन्ना-बन्नी, चैती-सोहर.
सोंठ-हरीरा, खा-पी जीभर..
कागा सुन कोयल की बानी.
कहे कहानी, आँख का पानी..

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divyanarmada.blogspot.com

मंगलवार, 3 नवंबर 2009

स्मृति गीत: संजीव 'सलिल'

स्मृति गीत:

संजीव 'सलिल'

सृजन विरासत

तुमसे पाई...

*

अलस सवेरे

उठते ही तुम,

बिन आलस्य

काम में जुटतीं.

सिगडी, सनसी,

चिमटा, चमचा

चौके में

वाद्यों सी बजतीं.

देर हुई तो

हमें जगाने

टेर-टेर

आवाज़ लगाई.

सृजन विरासत

तुमसे पाई...

*

जेल निरीक्षण

कर आते थे,

नित सूरज

उगने के पहले.

तव पाबंदी,

श्रम, कर्मठता

से अपराधी

रहते दहले.

निज निर्मित

व्यक्तित्व, सफलता

पाकर तुमने

सहज पचाई.

सृजन विरासत

तुमसे पाई...

*

माँ!-पापा!

संकट के संबल

गए छोड़कर

हमें अकेला.

विधि-विधान ने

हाय! रख दिया

है झिंझोड़कर

विकट झमेला.

तुम बिन

हर त्यौहार अधूरा,

खुशी पराई.

सृजन विरासत

तुमसे पाई...

*

यह सूनापन

भी हमको

जीना ही होगा

गए मुसाफिर.

अमिय-गरल

समभावी हो

पीना ही होगा

कल की खातिर.

अब न

शीश पर छाँव,

धूप-बरखा मंडराई.

सृजन विरासत

तुमसे पाई...

*

वे क्षर थे,

पर अक्षर मूल्यों

को जीते थे.

हमने देखा.

कभी न पाया

ह्रदय-हाथ

पल भर रीते थे

युग ने लेखा.

सुधियों का

संबल दे

प्रति पल राह दिखाई..

सृजन विरासत

तुमसे पाई...


*

मंगलवार, 26 अगस्त 2008

गीत: संध्या के माथे पर

संध्या के माथे पर
सूरज सिंदूर।
मोह रहा मन को
नीलाभी नभ-नूर...

बांचते परिंदे नित
प्रेम की कथाएँ।
घोंसले छिपाते
अनुबंध की व्यथाएं।
अंतर के मंतर से
अंतर्मन घायल-
भुला रही भाषायें
नेह की कथाएं।
अपने ही सपने
कर देते हैं चूर...

चिमनियाँ उगलती हैं,
रात-दिन धुंआ।
खान-कारखाने हैं,
मौत का कुँआ।
पूँजी के हाथ बिके
कौशल बेभाव-
भूखा सो गया, श्रम का
जठर फ़िर मुआं।
मदमाती हूटर की
कर्कश ध्वनि क्रूर...

शिक्षा की आहट,
नव कोशिश का दौर।
कोयल की कूक कहे
आम रहे बौर।
खास का न ग्रास बने
आम जन बचाओ।
चेतना मचान पर
सच की हो ठौर।
मृगनयनी नियतिनटी
जाने क्यों सूर?...

उषा वन्दनाएँ
रह गयीं अनपढ़ी।

दोपहर की भाग-दौड़
हाय अनगढ़ी।

संध्या को मोहिनी
प्रार्थना पदी।

साधना से अर्चना
कोसों है दूर...

लें-देन लील गया
निर्मल विश्वास।

स्वार्थहीन संबधों
पर है खग्रास।
तज गणेश अंक लिटा
लिखा रहे आज-

गीत-ग़ज़ल मेनका को
महा ऋषि व्यास।

प्रथा पूत तज चढाये
माथे पर धूर...

सीमेंटी भवन निठुर
लील लें पलाश

नेहहीन नातों की
ढोता युग लाश

तमस से अमावस के
ऊगेगी भोर-

धर्म-मर्म कर्म मान
लक्ष्य लें तलाश।

धीर धरो, पीर सहो,
काटो नासूर...

बहुत झुका विन्ध्य,
सिर उठाये-हँसे।

नर्मदा को जोहिला का
दंश न डँसे।

गुरु-गौरव द्रोण करे
पुनः न नीलाम-
कीचक के कपट में
सैरंध्री न फंसे।

'सलिल' सत्य कान्हा को
भज बनकर सूर...
*****