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शुक्रवार, 8 अक्टूबर 2010

बाल गीत: माँ-बेटी की बात --संजीव 'सलिल'

बाल गीत:

माँ-बेटी की बात

संजीव 'सलिल'
*
रानी जी को नचाती हैं महारानी नाच.

झूठ न इसको मानिये, बात कहूँ मैं साँच..

बात कहूँ मैं साँच, रूठ पल में जाती है.

पल में जाती बहल, बहारें ले आती है..

गुड़िया हाथों में गुड़िया ले सजा रही है.

लोरी गाकर थपक-थपक कर सुला रही है.

मारे सिर पर हाथ कहे: ''क्यों तंग कर रही?

क्यों न रही सो?, क्यों निंदिया से जंग कर रही?''

खीज रही है, रीझ रही है, हो बलिहारी.

अपनी गुड़िया पर मैया की गुड़िया प्यारी..

रानी माँ हैरां कहें: ''महारानी सो जाओ.

आँख बंद कर अनुष्का! सपनों में मुस्काओ.

तेरे पापा आ गए, खाना खिला, सुलाऊँ.

जल्दी उठाना है सुबह, बिटिया अब मैं जाऊँ?''

बिटिया बोली ठुमक कर: ''क्या वे डरते हैं?'

क्यों तुमसे थे कह रहे: 'तुम पर मरते हैं?

जीते जी कोई कभी कैसे मर सकता?

बड़े झूठ कहते तो क्यों कुछ फर्क नहीं पड़ता?''

मुझे डांटती: ''झूठ न बोलो तुम समझाती हो.

पापा बोलें झूठ, न उनको डांट लगाती हो.

मेरी गुड़िया नहीं सो रही, लोरी गाओ, सुलाओ.

नाम न पापा का लेकर, तुम मुझसे जान बचाओ''..

हुई निरुत्तर माँ गोदी में ले बिटिया को भींच.

लोरी गाकर सुलाया, ममता-सलिल उलीच..

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मंगलवार, 10 अगस्त 2010

माँ को अर्पित चौपदे : संजीव 'सलिल'


मातृ दिवस पर माँ को अर्पित चौपदे: संजीव 'सलिल'

Picture 128.jpg

बारिश में आँचल को छतरी, बना बचाती थी मुझको माँ.
जाड़े में दुबका गोदी में, मुझे सुलाती थी गाकर माँ..
गर्मी में आँचल का पंखा, झलती कहती नयी कहानी-
मेरी गलती छिपा पिता से, बिसराती थी मुस्काकर माँ..
*
मंजन स्नान आरती थी माँ, ब्यारी दूध कलेवा थी माँ.
खेल-कूद शाला नटख़टपन, पर्व मिठाई मेवा थी माँ..
व्रत-उपवास दिवाली-होली, चौक अल्पना राँगोली भी-
संकट में घर भर की हिम्मत, दीन-दुखी की सेवा थी माँ..


खाने की थाली में पानी, जैसे सबमें रहती थी माँ.
कभी न बारिश की नदिया सी कूल तोड़कर बहती थी माँ..
आने-जाने को हरि इच्छा मान, सहज अपना लेती थी-
सुख-दुःख धूप-छाँव दे-लेकर, हर दिन हँसती रहती थी माँ..
*
गृह मंदिर की अगरु-धूप थी, भजन प्रार्थना कीर्तन थी माँ.
वही द्वार थी, वातायन थी, कमरा परछी आँगन थी माँ..
चौका बासन झाड़ू पोंछा, कैसे बतलाऊँ क्या-क्या थी?-
शारद-रमा-शक्ति थी भू पर, हम सबका जीवन धन थी माँ..
*
कविता दोहा गीत गजल थी, रात्रि-जागरण चैया थी माँ.
हाथों की राखी बहिना थी, सुलह-लड़ाई भैया थी माँ.
रूठे मन की मान-मनौअल, कभी पिता का अनुशासन थी-
'सलिल'-लहर थी, कमल-भँवर थी, चप्पू छैंया नैया थी माँ..
*
आशा आँगन, पुष्पा उपवन, भोर किरण की सुषमा है माँ.
है संजीव आस्था का बल, सच राजीव अनुपमा है माँ..
राज बहादुर का पूनम जब, सत्य सहाय 'सलिल' होता तब-
सतत साधना, विनत वन्दना, पुण्य प्रार्थना-संध्या है माँ..
*
माँ निहारिका माँ निशिता है, तुहिना और अर्पिता है माँ
अंशुमान है, आशुतोष है, है अभिषेक मेघना है माँ..
मन्वंतर अंचित प्रियंक है, माँ मयंक सोनल सीढ़ी है-
ॐ कृष्ण हनुमान शौर्य अर्णव सिद्धार्थ गर्विता है माँ

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मंगलवार, 3 नवंबर 2009

स्मृति गीत: संजीव 'सलिल'

स्मृति गीत:

संजीव 'सलिल'

सृजन विरासत

तुमसे पाई...

*

अलस सवेरे

उठते ही तुम,

बिन आलस्य

काम में जुटतीं.

सिगडी, सनसी,

चिमटा, चमचा

चौके में

वाद्यों सी बजतीं.

देर हुई तो

हमें जगाने

टेर-टेर

आवाज़ लगाई.

सृजन विरासत

तुमसे पाई...

*

जेल निरीक्षण

कर आते थे,

नित सूरज

उगने के पहले.

तव पाबंदी,

श्रम, कर्मठता

से अपराधी

रहते दहले.

निज निर्मित

व्यक्तित्व, सफलता

पाकर तुमने

सहज पचाई.

सृजन विरासत

तुमसे पाई...

*

माँ!-पापा!

संकट के संबल

गए छोड़कर

हमें अकेला.

विधि-विधान ने

हाय! रख दिया

है झिंझोड़कर

विकट झमेला.

तुम बिन

हर त्यौहार अधूरा,

खुशी पराई.

सृजन विरासत

तुमसे पाई...

*

यह सूनापन

भी हमको

जीना ही होगा

गए मुसाफिर.

अमिय-गरल

समभावी हो

पीना ही होगा

कल की खातिर.

अब न

शीश पर छाँव,

धूप-बरखा मंडराई.

सृजन विरासत

तुमसे पाई...

*

वे क्षर थे,

पर अक्षर मूल्यों

को जीते थे.

हमने देखा.

कभी न पाया

ह्रदय-हाथ

पल भर रीते थे

युग ने लेखा.

सुधियों का

संबल दे

प्रति पल राह दिखाई..

सृजन विरासत

तुमसे पाई...


*