कुण्डलिनी
आचार्य संजीव 'सलिल', संपादक दिव्य नर्मदा
करुणा संवेदन बिना, नहीं काव्य में तंत..
करुणा रस जिस ह्रदय में वह हो जाता संत.
वह हो जाता संत, न कोई पीर परायी.
आँसू सबके पोंछ, लगे सार्थकता पाई.
कंकर में शंकर दिखते, होता मन-मंथन.
'सलिल' व्यर्थ है गीत, बिना करुणा संवेदन.
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http://divyanarmada.blogspot.com/
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शनिवार, 9 जनवरी 2010
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