नवगीत:
पशुपतिनाथ! तुम्हारे रहते
Photo by Hey Paul
पशुपतिनाथ!
तुम्हारे रहते
जनगण हुआ अनाथ?
तुम्हारे रहते
जनगण हुआ अनाथ?
वसुधा मैया भईं कुपित
डोल गईं चट्टानें
किसमें बूता
धरती कब
काँपेगी अनुमाने?
देख-देख भूडोल
चकित क्यों?
सीखें रहना साथ,
अनसमझा भूकम्प न हो अब
मानवता का काल
पृथ्वी पर भूचाल,
हुए, हो रहे, सदा होएंगे
हम जीना सीखेंगे या
हो नष्ट बिलख रोएँगे?
जीवन शैली गलत हमारी
करे प्रकृति से बैर
रहें सुरक्षित पशु-पक्षी, तरु
नहीं हमारी खैर,
जैसी करनी
वैसी भरनी
फूट रहा है माथ
पशुपतिनाथ!
तुम्हारे रहते
जनगण हुआ अनाथ?
डोल गईं चट्टानें
किसमें बूता
धरती कब
काँपेगी अनुमाने?
देख-देख भूडोल
चकित क्यों?
सीखें रहना साथ,
अनसमझा भूकम्प न हो अब
मानवता का काल
पृथ्वी पर भूचाल,
हुए, हो रहे, सदा होएंगे
हम जीना सीखेंगे या
हो नष्ट बिलख रोएँगे?
जीवन शैली गलत हमारी
करे प्रकृति से बैर
रहें सुरक्षित पशु-पक्षी, तरु
नहीं हमारी खैर,
जैसी करनी
वैसी भरनी
फूट रहा है माथ
पशुपतिनाथ!
तुम्हारे रहते
जनगण हुआ अनाथ?
टैक्टानिक हलचल को समझें
हटें-मिलें भू-प्लेटें
ऊर्जा विपुल
मुक्त हो फैले
भवन तोड़, भू मेटें,
रहे लचीला
तरु न टूटे
अड़ियल भवन चटकता,
नींव न जो
मज़बूत रखे
वह जीवन-शैली खोती
उठी अकेली जो
ऊँची मीनार
भग्न हो रोती,
वन हरिया दें, रुके भूस्खलन
कम हो तभी विनाश,
बंधन हो मज़बूत, न ढीले
रहें हमारे पाश,
छूट न पायें
कसकर थामें
‘सलिल’ हाथ में हाथ
पशुपतिनाथ!
तुम्हारे रहते
जनगण हुआ अनाथ?
हटें-मिलें भू-प्लेटें
ऊर्जा विपुल
मुक्त हो फैले
भवन तोड़, भू मेटें,
रहे लचीला
तरु न टूटे
अड़ियल भवन चटकता,
नींव न जो
मज़बूत रखे
वह जीवन-शैली खोती
उठी अकेली जो
ऊँची मीनार
भग्न हो रोती,
वन हरिया दें, रुके भूस्खलन
कम हो तभी विनाश,
बंधन हो मज़बूत, न ढीले
रहें हमारे पाश,
छूट न पायें
कसकर थामें
‘सलिल’ हाथ में हाथ
पशुपतिनाथ!
तुम्हारे रहते
जनगण हुआ अनाथ?
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