सोमवार, 16 जून 2014

geet ambar ka chhor -sanjiv

गीत 
अपने अम्बर का छोर 
संजीव 
*
मैंने थाम रखी 
अपनी वसुधा की डोर 
तुम थामे रहना 
अपने अंबर का छोर.… 
*
हल धर कर 
हलधर से, हल ना हुए सवाल 
पनघट में 
पन घट कर, पैदा करे बवाल
कूद रहे 
बेताल, मना वैलेंटाइन 
जंगल कटे, 
खुदे पर्वत, सूखे हैं ताल     
पजर गयी 
अमराई, कोयल झुलस गयी- 
नैन पुतरिया 
टँगी डाल पर, रोये भोर.… 
*
लूट सिया-सत 
हाय! सियासत इठलायी 
रक्षक पुलिस
हुई भक्षक, शामत आयी
अँधा तौले  
न्याय, कोट काला ले-दे 
शगुन विचारे  
शकुनी, कृष्णा पछतायी 
युवा सनसनी 
मस्ती मौज मजा चाहें-
आँख लड़ायें 
फिरा, न पोछें भीगी कोर.... 
*
सुर करते हैं 
भोग प्रलोभन दे-देकर
असुर भोगते 
बल के दम पर दम देकर
संयम खो, 
छलकर नर-नारी पतित हुए 
पाप छिपायें 
दोष और को दे-देकर 
मना जान की
खैर, जानकी छली गयी-
चला न आरक्षित 
जनप्रतिनिधि पर कुछ जोर.... 
*
सरहद पर 
सर हद करने आतंक डटा
दल-दल का 
दलदल कुछ लेकिन नहीं घटा 
बढ़ी अमीरी 
अधिक, गरीबी अधिक बढ़ी 
अंतर में पलता  
अंतर, बढ़ नहीं पटा 
रमा रमा में 
मन, आराम-विराम चहे-
कहे नहीं 'आ 
राम' रहा नाहक शोर.... 
*    
मैंने थाम रखी 
अपनी वसुधा की डोर 
तुम थामे रहना 
अपने अंबर का छोर.… 
*

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