मन का इकतारा
संजीव 'सलिल'
*

*
मन का इकतारा तुम ही तुम कहता है.
जैसे नेह नर्मदा में जल बहता है..
*
सब में रब या रब में सब को जब देखा.
देश धर्म भाषा का अंतर ढहता है..
*
जिसको कोई गैर न कोई अपना है.
हँस सबको वह, उसको सब जग सहता है..
*
मेरा बैरी मुझे कहाँ बाहर मिलता?
देख रहा हूँ मेरे भीतर रहता है..
*
जिसने जोड़ा वह तो खाली हाथ गया.
जिसने बाँटा वह ही थोड़ा गहता है..
*
जिसको पाया सुख की करते पहुनाई.
उसको देखा बैठ अकेले दहता है..
*
सच का सूत न समय कात पाया लेकिन
सच की चादर 'सलिल' कबीरा तहता है.
****
दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम
सब मे रब या रब में सब को जब देखा
जवाब देंहटाएंदेश धर्म भाषा का अंतर ढहता है
समभाव शायद इसी को कहते हैं
बहुत सुन्दर
अति सुन्दर!!
जवाब देंहटाएंवाह ! बहुत बढ़िया !!
जवाब देंहटाएंअति सुन्दर ...
जवाब देंहटाएंसलिल जी ! कृपया आज शाम यहाँ एक नजर देख लें - http://shikhakriti.blogspot.com