सोमवार, 6 दिसंबर 2021
छंद झूलना, झूलना छंद, नवगीत, मुक्तक, दोहा, लघुकथा, गीत
सोमवार, 17 अगस्त 2015
muktak geet
मंगलवार, 5 मई 2015
navgeet: jaisa boya -sanjiv
जैसा बोया
संजीव
*
जैसा बोया
वैसा पाया
.
तुमने मेरा
मन तोड़ा था
सोता हुआ
मुझे छोड़ा था
जगी चेतना
अगर तुम्हारी
मुझे नहीं
क्यों झिंझोड़ा था?
सुत रोया
क्या कभी चुपाया?
जैसा बोया
वैसा पाया
.
तुम सोये
मैं रही जागती
क्या होता
यदि कभी भागती?
क्या तर पाती?
या मर जाती??
अच्छा लगता
यदि तड़पाती??
केवल खुद का
उठना भाया??
जैसा बोया
वैसा पाया
.
सात वचन
पाये झूठे थे.
मुझे तोड़
तुम भी टूटे थे.
अति बेमानी
जान सके जब
कहो नहीं क्यों
तुम लौटे थे??
खीर-सुजाता ने
भरमाया??
जैसा बोया
वैसा पाया
.
घर त्यागा
भिक्षा की खातिर?
भटके थे
शिक्षा की खातिर??
शिक्षा घर में भी
मिलती है-
नहीं बताते हैं
सच शातिर
मूरत गढ़
जग ने झुठलाया
जैसा बोया
वैसा पाया
.
मन मंदिर में
तुम्हीं विराजे
मूरत बना
बजाते बाजे
जो, वे ही
प्रतिमा को तोड़ें
उनका ढोंग
उन्हीं को साजे
मैंने दोनों में
दुःख पाया
जैसा बोया
वैसा पाया
.
तुम, शोभा की
वस्तु बने हो
कहो नहीं क्या
कर्म सने हो?
चित्र गुप्त
निर्मल रख पाये??
या विराग के
राग घने हो??
पूज रहा जग
मगर भुलाया
जैसा बोया
वैसा पाया
.
navgeet: dhaee aakahr -sanjiv,
ढाई आखर
संजीव
*
जिन्स बना
बिक रहा आजकल
ढाई आखर।।
.
दाँत दूध के टूट न पाये
पर वयस्क हैं।
नहीं सुंदरी नर्स इसलिए
अनमयस्क हैं।
चूस रहे अंगूठा लेकिन
आँख मारते-
बाल भारती पढ़ न सकें
डेटिंग परस्त हैं।
हर उद्यान
काम-क्रीड़ा हित
इनको बाखर।
जिन्स बना
बिक रहा आजकल
ढाई आखर।।
.
मकरध्वज घुट्टी में शायद
गयी पिलायी।
वात्स्यायन की खोज
गर्भ में गयी सुनायी।
मान देह को माटी; माटी से
मिलते हैं-
कीचड़ किया, न शतदल कलिका
गयी खिलायी।
मन अनजाना
केवल तन; इनको
जलसाघर।
जिन्स बना
बिक रहा आजकल
ढाई आखर।
.
माता-पिता बोझ अनचाहा
छूटे पीछा-
मिले विरासत में दौलत;
कर्तव्य न रुचते।
खोज रहे हैं
साथी; साथी
जिन्स बना
बिक रहा आजकल
ढाई आखर।
.
navgeet: - sanjiv
नवगीत:
बाँस बना ताज़ा अखबार

ताज़ा अखबार,
ख़बर बनाई खूब,
पत्रकार नेता गए
चर्चाओं में डूब,
जानेवाला गया है
उनको तनिक न रंज
क्षुद्र स्वार्थ हित कर रहे
जो औरों पर तंज़,
ले किसान से सेठ को
दे ज़मीन सरकार
क्यों नादिर सा कर रही
जन पर अत्याचार?
बिना शुबह बाँस तना
जन का हथियार
अलस्सुबह बाँस बना
ताज़ा अखबार,
गाँव हुआ असहाय,
चिंता तनिक न शहर को
टंसुए श्रमिक बहाय,
वनवासी से वन छिना
विवश उठे हथियार
आतंकी कह भूनतीं
बंदूकें हर बार,
‘ससुरों की ठठरी बँधे’
कोसे बाँस उदास
पछुआ चुप पछता रही
कोयल चुप है खाँस
करता पर कहता नहीं
बाँस कभी उपकार
अलस्सुबह बाँस बना
ताज़ा अखबार|
navgeet: apanon par -sanjiv,
नवगीत:
अपनों पर

अपनों की
तिरछी रहीं निगाहें,
दूर न होता शक का रोग
बलिदानी को युग भूले
अवसरवादी करता भोग
सत्य न सुन
सह पाते
झूठी होती वाहें
अपनों पर
अपनों की
तिरछी रहीं निगाहें,
साथ उसी के था जनमत
सिद्धांतों की लेकर आड़
हुआ स्वार्थियों का जमघट
बलिदानी
कब करते
औरों की परवाहें
अपनों पर
अपनों की
तिरछी रहीं निगाहें,
सत्ता छिने न, भय खाते
छिपते नहीं कारनामे
जन-सम्मुख आ ही जाते
जननायक
का स्वांग
पाल रहे डाहें
अपनों पर
अपनों की
तिरछी रहीं निगाहें,
बिना बाज़ी लड़े जीता
हो वैरागी की तपस्या
घट भरा वह, शेष रीता
जन के मध्य
रहा वह
चाही नहीं पनाहें
अपनों पर
अपनों की
तिरछी रहीं निगाहें,
खुद को झोंक न पाया
उठा हुआ उसका पग
कोई रोक न पाया
सबको सत्य
बताओ, जन की
सुनो सलाहें
अपनों पर
अपनों की
तिरछी रहीं निगाहें|
navgeet: dharti ki chati fati -sanjiv
नवगीत:
धरती की छाती फटी

फैला हाहाकार
सभी जगह मानव हैरान
क्रंदन-रुदन न रुकता है
जागा क्या कोई शैतान?
विधना हमसे क्यों रूठा?
क्या करुणा सागर झूठा?
किया भरोसा क्या नाहक
पल भर में ऐसे टूटा?
डसते सर्पों से सवाल
बार-बार फुँफकार
धरती की छाती फटी
फैला हाहाकार
कभी नहीं हारे भूकंप
एक प्राकृतिक घटना है
दोष न स्वीकारे भूकंप
दोषपूर्ण निर्माण किये
मानव ने खुद प्राण दिए
वन काटे, पर्वत खोदे
खुद ही खुद के प्राण लिये
प्रकृति अनुकूल जीओ
मात्र एक उपचार
हर कोना मज़बूत करो
अलग न कोई भाग रहे
एकरूपता सदा धरो
जड़ मत हो घबराहट से
बिन सोचे ही मत दौड़ो
द्वार-पलंग नीचे छिपकर
राह काल की भी मोड़ो
फैलाता अफ़वाह जो
उसको दो फटकार
धरती की छाती फटी
फैला हाहाकार
मिले चिकित्सा करो जुगत
दीवारों से लग मत सो
रहो खुले में, वरो सुगत
तोड़ो हर कमज़ोर भवन
मलबा तनिक न रहे अगन
बैठो जा मैदानों में
हिम्मत देने करो जतन
दूर करो सब दूरियाँ
गले लगा दो प्यार
धरती की छाती फटी
फैला हाहाकार
nav geet: pashupati nath tumahare rahte -sanjiv
नवगीत:
पशुपतिनाथ! तुम्हारे रहते

तुम्हारे रहते
जनगण हुआ अनाथ?
डोल गईं चट्टानें
किसमें बूता
धरती कब
काँपेगी अनुमाने?
देख-देख भूडोल
चकित क्यों?
सीखें रहना साथ,
अनसमझा भूकम्प न हो अब
मानवता का काल
पृथ्वी पर भूचाल,
हुए, हो रहे, सदा होएंगे
हम जीना सीखेंगे या
हो नष्ट बिलख रोएँगे?
जीवन शैली गलत हमारी
करे प्रकृति से बैर
रहें सुरक्षित पशु-पक्षी, तरु
नहीं हमारी खैर,
जैसी करनी
वैसी भरनी
फूट रहा है माथ
पशुपतिनाथ!
तुम्हारे रहते
जनगण हुआ अनाथ?
हटें-मिलें भू-प्लेटें
ऊर्जा विपुल
मुक्त हो फैले
भवन तोड़, भू मेटें,
रहे लचीला
तरु न टूटे
अड़ियल भवन चटकता,
नींव न जो
मज़बूत रखे
वह जीवन-शैली खोती
उठी अकेली जो
ऊँची मीनार
भग्न हो रोती,
वन हरिया दें, रुके भूस्खलन
कम हो तभी विनाश,
बंधन हो मज़बूत, न ढीले
रहें हमारे पाश,
छूट न पायें
कसकर थामें
‘सलिल’ हाथ में हाथ
पशुपतिनाथ!
तुम्हारे रहते
जनगण हुआ अनाथ?
रविवार, 10 जून 2012
नवगीत: कागा हँसकर बोले काँव... संजीव 'सलिल'
कागा हँसकर बोले काँव...
संजीव 'सलिल'
*
*
चले श्वास-चौसर पर
आसों का शकुनी नित दाँव.
मौन रो रही कोयल
कागा हँसकर बोले काँव...
*
सम्बंधों को अनुबंधों ने
बना दिया बाज़ार.
प्रतिबंधों के धंधों के
आगे दुनिया लाचार.
कामनाओं ने भावनाओं को
करा दिया नीलाम.
बाद को अच्छा माने दुनिया,
कहे बुरा बदनाम.
ठंडक देती धूप,
ताप रही बाहर बेहद छाँव.
मौन रो रही कोयल
कागा हँसकर बोले काँव...
*
सद्भावों की सती तजी,
वर राजनीति रथ्या.
हरिश्चंद्र ने त्याग सत्य,
चुन लिया असत मिथ्या..
सत्ता-शूर्पनखा हित लड़ते
हाय! लक्ष्मण-राम.
खुद अपने दुश्मन बन बैठे
कहें- विधाता वाम..
मोह शहर का किया
उजड़े अपने सुन्दर गाँव.
मौन रो रही कोयल
कागा हँसकर बोले काँव...
*
'सलिल' समय पर न्याय न होता,
करे देर अंधेर.
मार-मारकर बाज खा रहे
कुर्सी बैठ बटेर..
बेच रहे निष्ठाएँ अपनी,
बिना मोल बेदाम.
और कह रहे बेहयाई से
'भला करेंगे राम'.
अपने हाथों तोड़ खोजते
कहाँ खो गया ठाँव?
मौन रो रही कोयल
कागा हँसकर बोले काँव...
***************
दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम
रविवार, 5 फ़रवरी 2012
नवगीत: शीत से कँपती धरा --संजीव 'सलिल'
नवगीत:
शीत से कँपती धरा
संजीव 'सलिल'
*ओढ़नी है धूप
कोहरे में छिप न पाये
सूर्य का शुभ रूप
सियासत की आँधियों में उड़ाएँ सच की पतंग
बाँध जोता और माँझा, हवाओं से छेड़ जंग
उत्तरायण की अँगीठी में बढ़े फिर ताप-
आस आँगन का बदल रवि-रश्मियाँ दें रंग
स्वार्थ-कचरा फटक-फेंके
कोशिशों का सूप
मुँडेरे श्रम-काग बैठे सफलता को टेर
न्याय-गृह में देर कर पाये न अब अंधेर
लोक पर हावी नहीं हो सेवकों का तंत्र-
रजक-लांछित सिया वन जाए न अबकी बेर
झोपड़ी में तम न हो
ना रौशनी में भूप
पड़ोसी दिखला न पाए अब कभी भी आँख
शौर्य बाली- स्वार्थ रावण दबाले निज काँख
क्रौच को कोई न शर अब कभी पाये वेध-
आसमां को नाप ले नव हौसलों का पांख
समेटे बाधाएँ अपनी
कोख में अब कूप
*
बुधवार, 26 अगस्त 2009
नव गीत: जिनको कीमत नहीं समय की -आचार्य संजीव 'सलिल'
आचार्य संजीव 'सलिल'
जिनको कीमत नहीं
समय की
वे न सफलता
कभी वरेंगे...
*
समय न थमता,
समय न झुकता.
समय न अड़ता,
समय न रुकता.
जो न समय की
कीमत जाने,
समय नहीं
उसको पहचाने.
समय दिखाए
आँख तनिक तो-
ताज- तख्त भी
नहीं बचेंगे.....
*
समय सत्य है,
समय नित्य है.
समय तथ्य है,
समय कृत्य है.
साथ समय के
दिनकर उगता.
साथ समय के
शशि भी ढलता.
हो विपरीत समय
जब उनका-
राहु-केतु बन
ग्रहण डसेंगे.....
*
समय गिराता,
समय उठाता.
समय चिढाता,
समय मनाता.
दुर्योधन-धृतराष्ट्र
समय है.
जसुदा राधा कृष्ण
समय है.
शूल-फूल भी,
गगन-धूल भी
'सलिल' समय को
नमन करेंगे...
***********
रविवार, 16 अगस्त 2009
नवगीत: मगरमचछ सरपंच... आचार्य संजीव् 'सलिल'
मगरमचछ सरपंच
मछलियाँ घेरे में
फंसे कबूतर आज
बाज के फेरे में...
सोनचिरैया विकल
न कोयल कूक रही
हिरनी नाहर देख
न भागी, मूक रही
जुड़े पाप ग्रह सभी
कुण्डली मेरे में...
गोली अमरीकी
बोली अंगरेजी है
ऊपर चढ़ क्यों
तोडी स्वयं नसेनी है?
सन्नाटा छाया
जनतंत्री डेरे में...
हँसिया फसलें
अपने घर में भरता है
घोड़ा-माली
हरी घास ख़ुद चरता है
शोले सुलगे हैं
कपास के डेरे में...
*****
शुक्रवार, 7 अगस्त 2009
गीत: हम गिर-उठकर खड़े हुए हैं
हम गिर-उठकर
खड़े हुए हैं।
जो न गिरे
वे पड़े हुए हैं...
सूरत-सूरत
सुंदर मूरत,
कहीं न कुछ भी
बिना जरूरत।
पल-प्रति पल
जो जिए बदलकर,
जुड़े टूटकर-
जमे पिघलकर।
जो न महकते
सड़े हुए हैं...
कंकर-कंकर
देखे शंकर।
शिव-शव दोनों
ही प्रलयंकर।
मन्दिर-मन्दिर
बजाते घंटे;
पचा प्रसादी-
पलते पंडे।
तकदीरों से
बड़े हुए हैं...
ये भी, वे भी
दोनों कच्चे,
ख़ुद को बड़ा
समझते बच्चे।
सीख न पाते
किंतु सिखाते,
पुष्प वृक्ष से
झडे हुए हैं...
*****
शनिवार, 1 अगस्त 2009
गीत: अपने-सपने कर नीलाम
गीत
अपने सपने
कर नीलाम
औरों के कुछ
आयें काम...
तजें अयोध्या
अपने हित की
गहें राह चुप
सबके हित की
लोक हितों की
कैकेयी अनुकूल
न अब हो वाम...
लोक नीति की
रामदुलारी
परित्यक्ता
जनमत की मारी
वैश्वीकरण
रजक मतिहीन
बने- बिगाडे काम...
जनमत-
बेपेंदी का लोटा
सत्य-समझ का
हरदम टोटा
मन न देखता
देख रहा
है 'सलिल' चमकता चाम...
*****
गुरुवार, 21 मई 2009
नवगीत प्लेटफॉर्म सा... संजीव वर्मा 'सलिल'
गुरुवार, 14 मई 2009
नवगीत: कहीं धूप क्यों?,
कहीं धूप क्यों?,
कहीं छाँव क्यों??...
सबमें तेरा
अंश समाया,
फ़िर क्यों
भरमाती है काया?
जब पाते तब-
खोते हैं क्यों?
जब खोते तब
पाते पाया।
अपने चलते
सतत दाँव क्यों?...
नीचे-ऊपर,
ऊपर-नीचे।
झूलें सब
तू डोरी खींचे,
कोई डरता,
कोई हँसता।
कोई रोये
अँखियाँ मींचे।
चंचल-घायल
हुए पाँव क्यों?...
तन पिंजरे में
मन बेगाना।
श्वास-आस का
ताना-बाना।
बुनता-गुनता
चुप सर धुनता।
तू परखे, दे
संकट नाना।
सूना पनघट,
मौन गाँव क्यों?...
******
शनिवार, 18 अप्रैल 2009
नवगीत: तन गाड़ी को चला रहा मन
नव गीत
तन गाड़ी को
चला रहा मन
सौ-सौ कोडे मार;
स्वार्थ सेठ की
करना होगी
तुझे विवश बेगार...
आस-प्यास हैं
दो कारिंदे
निर्दय-निठुर
फेंकते फंदे
जाने-अनजाने
फंस जाते हम
हिम्मत को हार...
चाहा जागें
पर हम सोये
भूल-भुलैयां में
फंस खोये
मृगतृष्णा में
लालच ने
भटकाया
कर लाचार॥
नेह नर्मदा
नहा न पाये
कलुष-कुटिलता
बहा न पाये
काला-पीला
करो सिखाता
दुनिया का बाज़ार...
*****
मंगलवार, 26 अगस्त 2008
गीत: स्वप्नों को आने दो
द्वार खटखटाने दो।
स्वप्नों की दुनिया में
ख़ुद को खो जाने दो...
जब हम थक सोते हैं,
हार मान रोते हैं।
सपने आ चुपके से
उम्मीदें बोते हैं।
कोशिश का हल-बक्खर
नित यथार्थ धरती पर
आशा की मूठ थाम
अनवरत चलाने दो...
मन को मत भरमाओ,
सच से मत शर्माओ।
साज उठा, तार छेड़,
राग नया निज गाओ।
ऊषा की लाली ले,
नील गगन प्याली ले।
कर को कर तूलिका
मन को कुछ बनाने दो...
नर्मदा सा बहना है।
निर्मलता गहना है।
कालकूट पान कर
कंठ-धार गहना है।
उत्तर दो उत्तर को,
दक्षिण से आ अगस्त्य।
बहुत झुका विन्ध्य दीं
अब तो सिर उठाने दो...
क्यों गुपचुप बैठे हो?
विजन वन में पैठे हो।
धर्म-कर्म मर्म मान,
किसी से न हेठे हो।
आँख मूँद चलना मत,
ख़ुद को ख़ुद छलना मत।
ऊसर में आशान्कुर
पल्लव उग आने दो...
********

