शुक्रवार, 7 अगस्त 2009

गीत: हम गिर-उठकर खड़े हुए हैं

गीत

हम गिर-उठकर

खड़े हुए हैं।

जो न गिरे

वे पड़े हुए हैं...

सूरत-सूरत

सुंदर मूरत,

कहीं न कुछ भी

बिना जरूरत।

पल-प्रति पल

जो जिए बदलकर,

जुड़े टूटकर-

जमे पिघलकर।

जो न महकते

सड़े हुए हैं...

कंकर-कंकर

देखे शंकर।

शिव-शव दोनों

ही प्रलयंकर।

मन्दिर-मन्दिर

बजाते घंटे;

पचा प्रसादी-

पलते पंडे।

तकदीरों से

बड़े हुए हैं...

ये भी, वे भी

दोनों कच्चे,

ख़ुद को बड़ा

समझते बच्चे।

सीख न पाते

किंतु सिखाते,

पुष्प वृक्ष से

झडे हुए हैं...

*****

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