रविवार, 16 अगस्त 2009

नवगीत: मगरमचछ सरपंच... आचार्य संजीव् 'सलिल'

गीत

मगरमचछ सरपंच
मछलियाँ घेरे में
फंसे कबूतर आज
बाज के फेरे में...

सोनचिरैया विकल
न कोयल कूक रही
हिरनी नाहर देख
न भागी, मूक रही
जुड़े पाप ग्रह सभी
कुण्डली मेरे में...

गोली अमरीकी
बोली अंगरेजी है
ऊपर चढ़ क्यों
तोडी स्वयं नसेनी है?
सन्नाटा छाया
जनतंत्री डेरे में...

हँसिया फसलें
अपने घर में भरता है
घोड़ा-माली
हरी घास ख़ुद चरता है
शोले सुलगे हैं
कपास के डेरे में...

*****

5 टिप्‍पणियां:

  1. सन्नाटा छाया
    जनतंत्री डेरे में

    - सुन्दर .

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  2. saty ko taraash kar aise dhardar bana dena ki wah pathak ke man me gahre utar paathak ko vyagra kar de us tarsadi ko chhinn bhinn kar dene hetu......yahi to kalamkaar ki praveenta hai...

    aap to sidhhast hain...isliye rachna ki prashansha kya karun.....haan,jo baat aapne kahi,wah vicharon ko udwelit kar hame sajag kar gayin ,apni or se apne poorn samarthy ke saath avyavastha ko samapt karne ki or prayaas karne ko prastut hone hetu...yah aapke rachna ke sarthkta ka pramaan hai...
    Sadhuwaad swikaren...

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  3. इस सुन्दर नव-गीत के लिए बधाई,
    साथ ही आपको जन्म-दिन की भी
    हार्दिक शुभकामनाएँ।

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