गुरुवार, 14 मई 2009

नवगीत: कहीं धूप क्यों?,

कहीं धूप क्यों?,
कहीं छाँव क्यों??...


सबमें तेरा
अंश समाया,
फ़िर क्यों
भरमाती है काया?

जब पाते तब-
खोते हैं क्यों?
जब खोते तब
पाते पाया।

अपने चलते
सतत दाँव क्यों?...

नीचे-ऊपर,
ऊपर-नीचे।
झूलें सब
तू डोरी खींचे,

कोई डरता,
कोई हँसता।
कोई रोये
अँखियाँ मींचे।

चंचल-घायल
हुए पाँव क्यों?...

तन पिंजरे में
मन बेगाना।
श्वास-आस का
ताना-बाना।

बुनता-गुनता
चुप सर धुनता।
तू परखे, दे
संकट नाना।

सूना पनघट,
मौन गाँव क्यों?...

******

4 टिप्‍पणियां:

  1. मौन गाँव क्यों....एक गहन प्रश्न उठाता गीत..बहुत उम्दा!!

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  2. सलिल जी

    श्रेष्‍ठ रचना। बधाई।

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  3. soona panghat, maun maun gaaon kyun.

    wah, anupam rachna, verma ji badhai.

    उत्तर देंहटाएं
  4. दार्शनिकता का पुट लिए हुए ,एक खूबसूरत नवगीत

    उत्तर देंहटाएं

छोटी सी ये दुनिया...

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