गुरुवार, 15 अक्तूबर 2009

नवगीत: राह हेरते समय न कटता...

नवगीत:

राह हेरते
समय न कटता...

*

पल दो पल भी
साथ तुम्हारा
पाने मन
तरसा करता है.
विरह तप्त
मन के मरुथल पर
मिलन मेघ
बरसा करता है.

भू की
रूप छटा नित हेरे-
बादल-मनुआ
ललच बरसता.
राह हेरते
समय न कटता...

*

नहीं समय से
पहले कुछ हो.
और न कुछ भी
बाद समय के.
नेह नर्मदा की
लहरों में
उठते हैं
तूफ़ान विलय के.

तन को मन का
मन को तन का
मिले न यदि
स्पर्श अखरता.
राह हेरते
समय न कटता...

*

अगर न दूरी
हो तो कैसे
मूल्य ज्ञात हो
अपनेपन का.
अगर अधूरी
रहें न आसें
कौन बताये
स्नेह स्वजन का?

शूल फूल में
फूल शूल में,
'सलिल' अनकहा
रिश्ता पलता.
राह हेरते
समय न कटता...

*
-divyanarmada.blogspot.com

बुधवार, 14 अक्तूबर 2009

नवगीत: आओ! मिलकर बाँटें-खायें... -आचार्य संजीव 'सलिल'

नवगीत

आचार्य संजीव 'सलिल'

आओ! मिलकर
बाँटें-खायें...
*
करो-मरो का
चला गया युग.
समय आज
सहकार का.
महाजनी के
बीत गये दिन.
आज राज
बटमार का.
इज्जत से
जीना है यदि तो,
सज्जन घर-घुस
शीश बचायें.
आओ! मिलकर
बाँटें-खायें...
*
आपा-धापी,
गुंडागर्दी.
हुई सभ्यता
अभिनव नंगी.
यही गनीमत
पहने चिथड़े.
ओढे है
आदर्श फिरंगी.
निज माटी में
नहीं जमीन जड़,
आसमान में
पतंग उडाएं.
आओ! मिलकर
बाँटें-खायें...
*
लेना-देना
सदाचार है.
मोल-भाव
जीवनाधार है.
क्रय-विक्रय है
विश्व-संस्कृति.
लूट-लुटाये
जो-उदार है.
निज हित हित
तज नियम कायदे.
स्वार्थ-पताका
मिल फहरायें.
आओ! . मिलकर
बाँटें-खायें...

*****************
दिव्यनर्मदा.ब्लॉगस्पॉट.कॉम

सोमवार, 12 अक्तूबर 2009

दोहा गीत: मातृ ज्योति- दीपक पिता,

दोहा गीत

विजय विषमता तिमिर पर,
कर दे- साम्य हुलास..
मातृ ज्योति- दीपक पिता,
शाश्वत चाह उजास....

*

जिसने कालिख-तम पिया,
वह काली माँ धन्य.
नव प्रकाश लाईं प्रखर,
दुर्गा देवी अनन्य.
भर अभाव को भाव से,
लक्ष्मी हुईं प्रणम्य.
ताल-नाद, स्वर-सुर सधे,
शारद कृपा सुरम्य.
वाक् भारती माँ, भरें
जीवन में उल्लास.
मातृ ज्योति- दीपक पिता,
शाश्वत चाह उजास...

*

सुख-समृद्धि की कामना,
सबका है अधिकार.
अंतर से अंतर मिटा,
ख़त्म करो तकरार.
जीवन-जगत न हो महज-
क्रय-विक्रय व्यापार.
सत-शिव-सुन्दर को करें
सब मिलकर स्वीकार.
विषम घटे, सम बढ़ सके,
हो प्रयास- सायास.
मातृ ज्योति- दीपक पिता,
शाश्वत चाह उजास....

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= दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम

नव गीत: हर जगह दीवाली है...

नव गीत
कुटिया हो या महल
हर जगह दीवाली है...

*

तप्त भास्कर,
त्रस्त धरा,
थे पस्त जीव सब.
राहत पाई,
मेघदूत
पावस लाये जब.
ताल-तालियाँ-
नदियाँ बहरीन,
उमंगें जागीं.
फसलें उगीं,
आसें उमगीं,
श्वासें भागीं.
करें प्रकाशित,
सकल जगत को
खुशहाली है.
कुटिया हो या महल
हर जगह दीवाली है....

*

रमें राम में,
किन्तु शारदा को
मत भूलें.
पैर जमाकर
'सलिल' धरा पर
नभ को छू लें.
किया अमंगल यहाँ-
वहाँ मंगल
हो कैसे?
मिटा विषमता
समता लायें
जैसे-तैसे.
मिटा अमावस,
लायें पूनम
खुशहाली है.
कुटिया हो या महल
हर जगह दीवाली है.

************

नव गीत दीपावली मना रे!...

नव गीत

हिल-मिल
दीपावली मना रे!...

*

चक्र समय का
सतत चल रहा.
स्वप्न नयन में
नित्य पल रहा.
सूरज-चंदा
उगा-ढल रहा.
तम प्रकाश के
तले पल रहा,
किन्तु निराश
न होना किंचित.
नित नव
आशा-दीप जला रे!
हिल-मिल
दीपावली मना रे!...

*

तन दीपक
मन बाती प्यारे!
प्यास तेल को
मत छलका रे!
श्वासा की
चिंगारी लेकर.
आशा-जीवन-
ज्योति जला रे!
मत उजास का
क्रय-विक्रय कर.
'सलिल' मुक्त हो
नेह लुटा रे!
हिल-मिल
दीपावली मना रे!...

**************

शब्दों की दीपावली आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'

Acharya Sanjiv Salil

http://divyanarmada.blogspot.com

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'

शब्दों की दीपावली

जलकर भी तम हर रहे, चुप रह मृतिका-दीप.

मोती पले गर्भ में, बिना कुछ कहे सीप.

सीप-दीप से हम मनुज तनिक न लेते सीख.

इसीलिए तो स्वार्थ में लीन पड़ रहे दीख.

दीप पर्व पर हों संकल्पित रह हिल-मिलकर.

दें उजियारा आत्म-दीप बन निश-दिन जलकर.

- छंद अमृतध्वनि

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