शनिवार, 20 फ़रवरी 2010

आदि शक्ति वंदना: संजीव वर्मा 'सलिल'

आदि शक्ति वंदना:

संजीव वर्मा 'सलिल'

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आदि शक्ति जगदम्बिके, विनत नवाऊँ शीश.
रमा-शारदा हों सदय, करें कृपा जगदीश....
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पराप्रकृति जगदम्बे मैया, विनय करो स्वीकार.
चरण-शरण हैं, शुभाशीष दे, करो मातु उद्धार.....
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अनुपम-अद्भुत रूप, दिव्य छवि, दर्शन कर जग धन्य.
कंकर से शंकर रचतीं माँ!, तुम सा कोई न अन्य..
परापरा, अणिमा-गरिमा, तुम रिद्धि-सिद्धि शत रूप.
दिव्य-भव्य, नित नवल-विमल छवि, माया-छाया-धूप..

जन्म-जन्म से भटक रहा हूँ, माँ ! भव से दो तार.
चरण-शरण हैं, शुभाशीष दे, करो मातु उद्धार.....
*
परापरा तुम, रिद्धि-सिद्धि तुम. नेह नर्मदा-नाद.
भाव, ताल,ध्वनि, स्वर, अक्षर तुम, रस, प्रतीक, संवाद..
दीप्ति, तृप्ति, संतुष्टि, सुरुचि तुम, तुम विराग-अनुराग.
उषा-लालिमा, निशा-कालिमा, प्रतिभा-कीर्ति-पराग.

प्रगट तुम्हीं से होते तुम में लीं सभी आकार.
चरण-शरण हैं, शुभाशीष दे, करो मातु उद्धार.....
*
वसुधा, कपिला, सलिलाओं में जननी तव शुभ बिम्ब.
क्षमा, दया , करुणा, ममता हैं मैया का प्रतिबिम्ब..
मंत्र, श्लोक, श्रुति, वेद-ऋचाएँ, करतीं महिमा गान-
करो कृपा माँ! जैसे भी हैं, हम तेरी संतान.
चरण-शरण हैं, शुभाशीष दे, करो मातु उद्धार.....


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रविवार, 14 फ़रवरी 2010

नवगीत: फगुनौटी त्यौहार. --संजीव 'सलिल'

नवगीत:

संजीव 'सलिल'

फागुन फगुनाई फगुनाहट
फगुनौटी त्यौहार.
रश्मिरथी हो विनत कर रहा
वसुधा की मनुहार.....
*
किरण-करों से कर आलिंगित
पोर-पोर ले चूम.
बौर खिलें तब आम्र-कुञ्ज में
विहँसे भू मासूम.
चंचल बरसाती सलिला भी
हुई सलज्जा नार.
कुलाचार तट-बंधन में बंध
चली पिया के द्वार.
वर्षा-मेघ न संग दीखते
मौन राग मल्हार.....
*
प्रकृति-सुंदरी का सिंगार लख
मोहित है ऋतुराज.
सदा लुभाता है बनिए को
अधिक मूल से ब्याज.
संध्या-रजनी-उषा त्रयी के
बीच फँसा है चंद.
मंद हुआ पर नहीं रच सका
अचल प्रणय का छंद.
पूनम-'मावस मिलन-विरह का
करा रहीं दीदार.....
*
अमराई, पनघट, पगडंडी,
रहीं लगाये आस.
पर तरुणाई की अरुणाई
तनिक न फटकी पास.
वैलेंटाइन वाइन शाइन
डेट गिफ्ट प्रेजेंट.
नवाचार में कदाचार का
मिश्रण है डीसेंट.
विस्मित तके बसंत नज़ारा
'सलिल' भटकता प्यार.....
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दोहा गीत: धरती ने हरियाली ओढी --संजीव 'सलिल'

धरती ने हरियाली ओढी,

मनहर किया सिंगार.,

दिल पर लोटा सांप

हो गया सूरज तप्त अंगार...

*

नेह नर्मदा तीर हुलसकर

बतला रहा पलाश.

आया है ऋतुराज काटने

शीत काल के पाश.


गौरा बौराकर बौरा की

करती है मनुहार.

धरती ने हरियाली ओढी,

मनहर किया सिंगार.

*

निज स्वार्थों के वशीभूत हो

छले न मानव काश.

रूठे नहीं बसंत, न फागुन

छिपता फिरे हताश.


ऊसर-बंजर धरा न हो,

न दूषित मलय-बयार.

धरती ने हरियाली ओढी,

मनहर किया सिंगार....

*
अपनों-सपनों का त्रिभुवन

हम खुद ना सके तराश.

प्रकृति का शोषण कर अपना

खुद ही करते नाश.


जन्म दिवस को बना रहे क्यों

'सलिल' मरण-त्यौहार?

धरती ने हरियाली ओढी,

मनहर किया सिंगार....
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छोटी सी ये दुनिया...

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