नव गीत
तन गाड़ी को
चला रहा मन
सौ-सौ कोडे मार;
स्वार्थ सेठ की
करना होगी
तुझे विवश बेगार...
आस-प्यास हैं
दो कारिंदे
निर्दय-निठुर
फेंकते फंदे
जाने-अनजाने
फंस जाते हम
हिम्मत को हार...
चाहा जागें
पर हम सोये
भूल-भुलैयां में
फंस खोये
मृगतृष्णा में
लालच ने
भटकाया
कर लाचार॥
नेह नर्मदा
नहा न पाये
कलुष-कुटिलता
बहा न पाये
काला-पीला
करो सिखाता
दुनिया का बाज़ार...
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