मंगलवार, 26 अगस्त 2008

गीत: स्वप्नों को आने दो

स्वप्नों को आने दो,
द्वार खटखटाने दो।
स्वप्नों की दुनिया में
ख़ुद को खो जाने दो...

जब हम थक सोते हैं,
हार मान रोते हैं।
सपने आ चुपके से
उम्मीदें बोते हैं।
कोशिश का हल-बक्खर
नित यथार्थ धरती पर
आशा की मूठ थाम
अनवरत चलाने दो...

मन को मत भरमाओ,
सच से मत शर्माओ।
साज उठा, तार छेड़,
राग नया निज गाओ।
ऊषा की लाली ले,
नील गगन प्याली ले।
कर को कर तूलिका
मन को कुछ बनाने दो...

नर्मदा सा बहना है।
निर्मलता गहना है।
कालकूट पान कर
कंठ-धार गहना है।
उत्तर दो उत्तर को,
दक्षिण से आ अगस्त्य।
बहुत झुका विन्ध्य दीं
अब तो सिर उठाने दो...

क्यों गुपचुप बैठे हो?
विजन वन में पैठे हो।
धर्म-कर्म मर्म मान,
किसी से न हेठे हो।
आँख मूँद चलना मत,
ख़ुद को ख़ुद छलना मत।
ऊसर में आशान्कुर
पल्लव उग आने दो...

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1 टिप्पणी:

  1. वाह ! वाह ! वाह !
    क्या कहूँ...............बहुत बहुत सुंदर रचना.मंत्रमुग्ध कर लिया इसने.

    कृपया अविलम्ब ब्लागवाणी पर अपने ब्लाग को रजिस्टर्ड करवा लें.इससे असंख्य पाठकों को आपके ब्लॉग तक पहुँचने का अवसर मिलेगा.

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