शनिवार, 1 अगस्त 2009

गीत: अपने-सपने कर नीलाम

गीत


अपने सपने

कर नीलाम

औरों के कुछ

आयें काम...

तजें अयोध्या

अपने हित की

गहें राह चुप

सबके हित की

लोक हितों की

कैकेयी अनुकूल

न अब हो वाम...

लोक नीति की

रामदुलारी

परित्यक्ता

जनमत की मारी

वैश्वीकरण

रजक मतिहीन

बने- बिगाडे काम...

जनमत-

बेपेंदी का लोटा

सत्य-समझ का

हरदम टोटा

मन न देखता

देख रहा

है 'सलिल' चमकता चाम...

*****

गुरुवार, 30 जुलाई 2009

गीत: चुप न रहें निज स्वर में गायें

गीत

चुप न रहें

निज स्वर में गायें;

निविड़ तिमिर में

दीप जलाएं...

फिक्र नहीं जो

जग ने टोका

बाधा दी

हर पग पर रोका

झेल प्रबल

तूफां का झोंका

मुश्किल में

सब मिल मुस्काएं...

कौन किसी का

सदा सगा है?

अपनेपन ने

छला-ठगा है

झूठा नाता

नेह पगा है

सत्य न यह

पल भर बिसराएँ...

कलकल निर्झेर

बन बहना है

सुख-दुःख सम

चुप रह सहना है

नहीं किसी से

कुछ कहना है

रुकें न

मंजिल पायें...

*****

छोटी सी ये दुनिया...

पाठक पंचायत:

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