मंगलवार, 17 मार्च 2009

गीत: श्वास गीत, आस-प्यास अंतरा -संजीव सलिल

गीत

श्वास गीत, आस-प्यास अंतरा।

सनातन है रास की परम्परा । ।

तन का नही, मन का मेल जिंदगी।

स्नेह-सलिल-स्नान ईश- बन्दगी।

नित सृजन ही सभ्यता औ' संस्कृति।

सृजन हेतु सृष्टि नित स्वयंवरा। ।

आदि-अंतहीन चक्र काल का।

सादि-सांत लेख मनुज-भाल का।

समर्पण घमंड, क्रोध, स्वार्थ का।

भावनाविहीन ज्ञान कोहरा । ।

राग-त्याग नहीं सत्य-साधना।

अनुराग औ' आसक्ति पूत भावना।

पुरातन है प्रकृति-पुरूष का मिलन।

निरावरण गगन, धारा दिगंबरा। ।

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रविवार, 15 मार्च 2009

गीत सोये बहुत देव अब जागो आचार्य संजीव 'सलिल'

गीत

सोये बहुत देव अब जागो

आचार्य संजीव 'सलिल'

सोये बहुत
देव! अब जागो...

तम ने
निगला है उजास को।
गम ने मारा
है हुलास को।
बाधाएँ छलती
प्रयास को।
कोशिश को
जी भर अनुरागो...

रवि-शशि को
छलती है संध्या।
अधरा धरा
न हो हरि! वन्ध्या।
बहुत झुका
अब झुके न विन्ध्या।
ऋषि अगस्त
दक्षिण मत भागो...

पलता दीपक टेल
त ले अँधेरा ।

हो निशांत
फ़िर नया सवेरा।
टूटे स्वप्न
न मिटे बसेरा।
कथनी-करनी
संग-संग पागो...

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छोटी सी ये दुनिया...

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