मंगलवार, 9 जून 2009

दोहागीत: तरु कदंब कटे बहुत... सलिल

अभिनव प्रयोग:

दोहा-गीत

-संजीव 'सलिल',संपादक दिव्य नर्मदा

तरु कदम्ब काटे बहुत,

चलो, लगायें एक।

स्नेह-सलिल सिंचन करें,

महकें सुमन अनेक...

*

मन-वृन्दावन में बसे,

कोशिश का घनश्याम।

तन बरसाना राधिका,

पाले कशिश अनाम॥

प्रेम-ग्रंथ के पढ़ सकें,

ढाई अक्षर नेक।

तरु कदम्ब काटे बहुत,

चलो, लगायें एक.....

*

कंस प्रदूषण का करें,

मिलकर सब जन अंत।

मुक्त कराएँ उन्हें जो

सत्ता पीड़ित संत॥

सुख-दुःख में जागृत रहे-

निर्मल बुद्धि-विवेक।

तरु कदम्ब काटे बहुत,

चलो, लगायें एक।

*

तरु कदम्ब विस्तार है,

संबंधों का मीत।

पुलक सुवासित हरितिमा,

सृजती जीवन-रीत॥

ध्वंस-नाश का पथ सकें,

निर्माणों से छेक।

तरु कदम्ब काटे बहुत,

चलो लगायें एक.....

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छोटी सी ये दुनिया...

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