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शनिवार, 29 अगस्त 2009

गीत: दिव्य सूर्य रश्मियाँ -सन्जीव 'सलिल'

दिव्य सूर्य-रश्मियाँ,
भव्य भाव भूमियाँ...

श्वास-आस दायिका,
रास-लास नायिका।
त्रास-ह्रास हरंकर-
उजास वर प्रदायिका।
ज्ञान-ध्यान-मानमय
सहज-सृजित सृष्टियाँ...

कमलनयन ध्यायिका,
विशेष शेष शायिका।
अनंत-दिग्दिगंत की,
अनादि आख्ययिका।
मूर्तिमंत नव बसंत
कंत श्याम तामिया...

गीत-ग़ज़ल गायिका,
नवल नाद नायिका।
श्रवण-मनन-सृजन-कथन,
व्यक्त व्याख्यायिका।
श्रम-लगन-समर्पण की-
चाह-राह दामिया...

सतत-प्रगत धाविका,
विगतागत वाहिका।
संग अपार 'सलिल'-धार
आर-पार नाविका।
रीत-गीत-प्रीतपरक
दृष्टादृष्ट दृष्टियाँ...

प्रणय-गंध सात्विका
विलय-बंध प्राप्तिका।
श्वास-रंध्र आपूरित-
मलयानिल आप्तिका।
संचारित-सुविचारित
आचारित ऊर्मियाँ

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शुक्रवार, 21 अगस्त 2009

गीत: कलम गीत की फसलें बोती

कलम गीत की
फसलें बोती...

शब्द सिपाही का
संबल बन,
नेह नर्मदा
या चम्बल बन,
सलिल तरंगें
अग-जग धोतीं...

परम्परा पिंजरे

में सिसके,
तोड़-छोड़
जाने में हिचके,
सहे पीर पर
धीर न खोती...

मन कोमल पर
तन कठोर है,
सांझ सुरमई
विमल भोर है।
स्वप्न सीप में,
सृजती मोती...

कभी खास है,
कभी आम है।
नाम अनेकों
पर अनाम है।
अरमानों की
मुखर संगोती...

फूल-शूल
पाषाण-धूल को।
शिखर-गगन को,
भूमि-मूल को
चुप अपने
कन्धों पर ढोती...

*****

रविवार, 16 अगस्त 2009

नवगीत: मगरमचछ सरपंच... आचार्य संजीव् 'सलिल'

गीत

मगरमचछ सरपंच
मछलियाँ घेरे में
फंसे कबूतर आज
बाज के फेरे में...

सोनचिरैया विकल
न कोयल कूक रही
हिरनी नाहर देख
न भागी, मूक रही
जुड़े पाप ग्रह सभी
कुण्डली मेरे में...

गोली अमरीकी
बोली अंगरेजी है
ऊपर चढ़ क्यों
तोडी स्वयं नसेनी है?
सन्नाटा छाया
जनतंत्री डेरे में...

हँसिया फसलें
अपने घर में भरता है
घोड़ा-माली
हरी घास ख़ुद चरता है
शोले सुलगे हैं
कपास के डेरे में...

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शुक्रवार, 7 अगस्त 2009

गीत: हम गिर-उठकर खड़े हुए हैं

गीत

हम गिर-उठकर

खड़े हुए हैं।

जो न गिरे

वे पड़े हुए हैं...

सूरत-सूरत

सुंदर मूरत,

कहीं न कुछ भी

बिना जरूरत।

पल-प्रति पल

जो जिए बदलकर,

जुड़े टूटकर-

जमे पिघलकर।

जो न महकते

सड़े हुए हैं...

कंकर-कंकर

देखे शंकर।

शिव-शव दोनों

ही प्रलयंकर।

मन्दिर-मन्दिर

बजाते घंटे;

पचा प्रसादी-

पलते पंडे।

तकदीरों से

बड़े हुए हैं...

ये भी, वे भी

दोनों कच्चे,

ख़ुद को बड़ा

समझते बच्चे।

सीख न पाते

किंतु सिखाते,

पुष्प वृक्ष से

झडे हुए हैं...

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मंगलवार, 26 अगस्त 2008

गीत: स्वप्नों को आने दो

स्वप्नों को आने दो,
द्वार खटखटाने दो।
स्वप्नों की दुनिया में
ख़ुद को खो जाने दो...

जब हम थक सोते हैं,
हार मान रोते हैं।
सपने आ चुपके से
उम्मीदें बोते हैं।
कोशिश का हल-बक्खर
नित यथार्थ धरती पर
आशा की मूठ थाम
अनवरत चलाने दो...

मन को मत भरमाओ,
सच से मत शर्माओ।
साज उठा, तार छेड़,
राग नया निज गाओ।
ऊषा की लाली ले,
नील गगन प्याली ले।
कर को कर तूलिका
मन को कुछ बनाने दो...

नर्मदा सा बहना है।
निर्मलता गहना है।
कालकूट पान कर
कंठ-धार गहना है।
उत्तर दो उत्तर को,
दक्षिण से आ अगस्त्य।
बहुत झुका विन्ध्य दीं
अब तो सिर उठाने दो...

क्यों गुपचुप बैठे हो?
विजन वन में पैठे हो।
धर्म-कर्म मर्म मान,
किसी से न हेठे हो।
आँख मूँद चलना मत,
ख़ुद को ख़ुद छलना मत।
ऊसर में आशान्कुर
पल्लव उग आने दो...

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