गुरुवार, 16 जुलाई 2009

गीत: अपना बिम्ब निहारो

दर्पण मत तोड़ो...

अपना बिम्ब निहारो दर्पण मत तोड़ो,
कहता है प्रतिबम्ब की दर्पण मत तोड़ो.
स्वयं सरह न पाओ, मन को बुरा लगे,
तो निज रूप संवारो,दर्पण मत तोड़ो....

शीश उठाकर चलो झुकाओ शीश नहीं.
खुद से बढ़कर और दूसरा ईश नहीं.
तुम्हीं परीक्षार्थी हो तुम्हीं परीक्षक हो,
खुद को खुदा बनाओ, दर्पण मत तोड़ो....

पथ पर पग रख दो तो मंजिल पग चूमे.
चलो झूम कर दिग्-दिगंत-वसुधा झूमे.
आदम हो इंसान बनोगे प्रण कर लो,
पंकिल चरण पखारो, दर्पण मत तोड़ो.

बांटो औरों में जो भी अमृतमय हो.
गरल कंठ में धारण कर लो निर्भय हो.
वरन मौत का कर जो जीवन पायें 'सलिल'.
इवन में उन्हें उतारो, दर्पण मत तोड़ो.

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शनिवार, 11 जुलाई 2009

गीत -संजीव 'सलिल' भाग्य निज पल-पल सराहूं

गीत


भाग्य निज पल-पल सराहूं,
जीत तुमसे, मीत हारूं.
अंक में सर धर तुम्हारे,
एक टक तुमको निहारूं...

नयन उन्मीलित, अधर कम्पित,
कहें अनकही गाथा.
तप्त अधरों की छुअन ने,
किया मन को सरगमाथा.
दीप-शिख बन मैं प्रिये!
नीराजना तेरी उतारूं...

हुआ किंशुक-कुसुम सा तन,
मदिर महुआ मन हुआ है.
विदेहित है देह त्रिभुवन,
मन मुखर काकातुआ है.
अछूते प्रतिबिम्ब की,
अंजुरी अनूठी विहंस वारूँ...

बांह में ले बांह, पूरी
चाह कर ले, दाह तेरी.
थाह पाकर भी न पाये,
तपे शीतल छांह तेरी.
विरह का हर पल युगों सा,
गुजारा, उसको बिसारूँ...

बजे नूपुर, खनक कंगना,
कहे छूटा आज अंगना.
देहरी तज देह री! रंग जा,
पिया को आज रंग ना.
हुआ फागुन, सरस सावन,
पी कहाँ, पी कंह? पुकारूं...

पंचशर साधे निहत्थे पर,
कुसुम आयुध चला, चल.
थाम लूँ न फिसल जाए,
हाथ से यह मनचला पल.
चांदनी अनुगामिनी बन.
चाँद वसुधा पर उतारूं...

मंगलवार, 16 जून 2009

गीत: राम कथाएँ - सलिल

गीत

सबकी अपनी-अपनी राम कथाएँ हैं।
सबकी अपनी-अपनी करुण-व्यथाएँ हैं....


अपने-अपने पिंजरों में हैं कैद सभी।
और चाहते हैं होना स्वच्छंद सभी।
श्वास-श्वास में कथ्य-कथानक हैं सबमें-
सत्य कहूँ गुन-गुन करते हैं छंद सभी।
अलग-अनूठे शिल्प-बिम्ब-उपमाएँ हैं
सबकी अपनी-अपनी राम कथाएँ हैं.....


अक्षर-अजर-अमर हैं आत्माएँ सबकी।
प्रेरक-प्रबल-अमित हैं इच्छाएँ सबकी।
माँग-पूर्ती, उपभोक्ता-उत्पादन हैं सब।
खन-खन करती मोहें मुद्राएँ सबकी।
रास रचता वह, सब बृज बालाएँ है
सबकी अपनी-अपनी राम कथाएँ हैं.....


जो भी मिलता है क्रेता-विक्रेता है।
किन्तु न कोई नौका अपनी खेता है।
किस्मत शकुनी के पाँसों से सब हारे।
फिर भी सोचा अगला दाँव विजेता है।
मौन हुई माँ, मुखर-चपल वनिताएँ हैं।
सबकी अपनी-अपनी राम कथाएँ हैं.....


करें अर्चना स्वहितों की तन्मय होकर।
वरें वंदना-पथ विधि का मृण्मय होकर।
करें कामना, सफल साधना हो अपनी।
लीन प्रार्थना में होते बेकल होकर।
तृप्ति-अतृप्ति नहीं कुछ, मृग- त्रिश्नाएं हैं।
सबकी अपनी-अपनी राम कथाएँ हैं.....


यह दुनिया मंडी है रिश्तों-नातों की।
दाँव-पेंच, छल-कपट, घात-प्रतिघातों की।
विश्वासों की फसल उगाती कलम सदा।
हर अंकुर में छवि है गिरते पातों की।
कूल, घाट, पुल, लहर, 'सलिल' सरिताएँ हैः।
सबकी अपनी-अपनी राम कथाएँ हैं.....

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मंगलवार, 9 जून 2009

दोहागीत: तरु कदंब कटे बहुत... सलिल

अभिनव प्रयोग:

दोहा-गीत

-संजीव 'सलिल',संपादक दिव्य नर्मदा

तरु कदम्ब काटे बहुत,

चलो, लगायें एक।

स्नेह-सलिल सिंचन करें,

महकें सुमन अनेक...

*

मन-वृन्दावन में बसे,

कोशिश का घनश्याम।

तन बरसाना राधिका,

पाले कशिश अनाम॥

प्रेम-ग्रंथ के पढ़ सकें,

ढाई अक्षर नेक।

तरु कदम्ब काटे बहुत,

चलो, लगायें एक.....

*

कंस प्रदूषण का करें,

मिलकर सब जन अंत।

मुक्त कराएँ उन्हें जो

सत्ता पीड़ित संत॥

सुख-दुःख में जागृत रहे-

निर्मल बुद्धि-विवेक।

तरु कदम्ब काटे बहुत,

चलो, लगायें एक।

*

तरु कदम्ब विस्तार है,

संबंधों का मीत।

पुलक सुवासित हरितिमा,

सृजती जीवन-रीत॥

ध्वंस-नाश का पथ सकें,

निर्माणों से छेक।

तरु कदम्ब काटे बहुत,

चलो लगायें एक.....

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शुक्रवार, 5 जून 2009

नवगीत: दीप-वर्तिका सदृश जलेंगे -आचार्य संजीव 'सलिल'

नव-गीत

दीप-वर्तिका

सदृश जलेंगे

आपद-विपदा

विहँस सहेंगे...

मौत वरेंगे पर न मरेंगे॥

हैं लघु कण

यह सत्य जानते,

पर विराट से

समर ठानते।

पचा न पायें

आप हलाहल,

धार कंठ में-

हम उबारते।

शिवता-सुन्दरता

के पथ पर-

सत का कर गह-

नित्य बढ़ेंगे...

मौत वरेंगे पर न मरेंगे॥

कहीं न परिमल

हर दल दलदल।

भ्रमर-दंश से

दंशित शतदल।

सलिल धार

अनवरत प्रवाहित।

शब्द अमरकंटक-

से प्रति पल।

लोक नर्मदा

नीति वर्मदा

कार्य शर्मदा

सतत करेंगे...

मौत वरेंगे पर न मरेंगे॥

अजर-अमर हैं

हम अक्षर हैं।

नाद-ताल हैं

सरगम-स्वर हैं।

हम अनादि हैं,

हम अनंत हैं।

सादि-सांत हम

क्षण-भंगुर हैं॥

सच कहते हैं

सब जग सुन ले,

सत-शिव-सुंदर

'सलिल' वरेंगे ...

मौत वरेंगे पर न मरेंगे॥

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शनिवार, 23 मई 2009

संस्मरण : संजीव 'सलिल'

संस्मरण :

ममतामयी महादेवी

नेह नर्मदा धार:

महीयसी महादेवी वर्मा केवल हिन्दी साहित्य नहीं अपितु विश्व वांग्मय की ऐसी धरोहर हैं जिन्हें पढने और समझने के लिए उनके धरातल तक उठना होगा। उनका विराट व्यक्तित्व और उदात्त कृतित्व उन्हें एक दिव्य आभा से मंडित करता तो उनकी निरभिमानता, सहजता और ममतामय दृष्टि नैकट्य की अनुभूति कराता। सफलता, यश और मान्यता के शिखर पर भी उनमें जैसी सरलता। सहजता, विनम्रता और सत्य के प्रति दृढ़ता थी वह अब दुर्लभ है।

पूज्य बुआश्री ने जिन मूल्यों का सृजन किया उन्हें अपने जीवन में मूर्तिमंत भी किया। 'नारी तुम केवल श्रृद्धा हो' लिखनेवाली कलम की स्वामिनी का लम्बा सामाजिक-साहित्यिक कार्यकाल अविवादित और निष्कलुष रहा। उनहोंने सबको स्नेह-सम्मान दिया और शतगुण पाया। उनके निकट हर अंतर्विरोध इस तरह विलीन हो जाता था जैसे पावस में पावक।

हर बड़ा-छोटा, साहित्यकार-कलाकार, समाजसेवी-राजनेता, वशिष्ट-सामान्य, भाषा-भूषा, पंथ-संप्रदाय, क्षेत्र-प्रान्त, मत-विमत का अंतर भूलकर उनके निकट आते ही उनके पारिवारिक सदस्य की तरह नेह-नर्मदा में अवगाहन कर धन्यता की प्रतीति कर पाता था। महीयसी ने महाकवि प्रसाद, दद्दा (मैथिलीशरण गुप्त), दादा (माखन लाल चतुर्वेदी), महापंडित राहुल जी, महाप्राण निराला, युगकवि पन्त, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, आचार्य नन्द दुलारे वाजपेयी, दिनकर, इलाचंद्र जोशी, अमृतलाल नागर, भगवतीचरण वर्मा, यशपाल, फणीश्वर नाथ 'रेणू', नवीन, सुमन, भारती, उग्र आदि तीन पीढियों के सरस्वती सुतों को अपने ममत्व और वात्सल्य से सराबोर किया। समस्त साहित्यिक-सामाजिक-राजनैतिक अंतर्विरोध उनकी उपस्थिति में स्वत विलीन या क्षीण हो जाते थे। उन्हें बापू और जवाहर से आशीष मिला तो अटल जी और इंदिरा जी से आत्मीयता और सम्मान।

ममता की शुचि मूर्ति वे, नेह नर्मदा धार।

माँ वसुधा का रत्न थीं, श्वासों का श्रृंगार॥

अपनेपन की चाह :

महादेवी जी में चिरंतन आदर्शों को जीवंत करने की ललक के साथ नव परम्पराओं से सृजित करने की पुलक भी थी। वे समग्रता की उपासक थीं। गौरवमयी विरासत के साथ सामयिक समस्याओं के सम्यक समाधान में उनकी तत्परता स्तुत्य थी। वे अपने सृजन संसार में लीन रहते हुए भी राष्ट्रीय, सामाजिक, पारिवारिक नातों तथा अपने उत्स के प्रति सतत सचेष्ट रहती थीं। उनका परिवार रक्त संबंधों नहीं, स्नेह संबंधों से बना था। अजनबी से अपने बने लेने में उनका सानी नहीं था। वे प्रशंसा का अमृत, आलोचना का गरल, सुख की धूप, दुःख की छाँव समभाव से ग्रहण कर निर्लिप्त रहती थीं।

सनातन सलिला नर्मदा तट पर स्थित संस्कारधानी जबलपुर उन्हें प्रिय रहा। जब भी अवसर मिलता वे जबलपुर आतीं और यहाँ के रचनाकारों पर आशीष बरसातीं। इस निकटता का प्रत्यक्ष कारण स्व. रामानुज लाल श्रीवास्तव 'ऊँट बिलहरीवी', नर्मदा प्रसाद खरे तथा उनकी प्राणप्रिय सखी सुभद्रा कुमारी चौहान थीं जो अपने पति ठाकुर लक्ष्मण सिंह चौहान के साथ स्वतंत्रता सत्याग्रहों की अलख जलाये थीं। दादा भी कर्मवीर के सिलसिले में बहुधा जबलपुर रहते।

मूल की तलाश:

जबलपुर से लगाव का परोक्ष कारण महादेवी जी की ननिहाल थी जो घटनाओं के प्रवाह में छूट चुकी थी। दो पीढियों के मध्य का अन्तराल नयी पीढियों का अपरिचय बन गया। वे किसी से कुछ न कहतीं पर मन से चाहतीं की बिछुडे परिजन कभी मिल सकें। अंततः,अपने अंतिम जबलपुर प्रवास में उनके धैर्य का बाँध टूट गया। उन्होंने सुभद्रा जी की मूर्ति के समीप हुए कवि सम्मेलन से संबोधित करते हुए जबलपुर में अपने ननिहाल होने की जानकारी दी तथा अपेक्षा की की उस परिवार में से कोई हो तो मिले।

साप्ताहिक हिंदुस्तान के होली विशेषांक में उनका एक साक्षात्कार छपा। प्रसिद्ध पत्रकार पी. डी. टन्डन से चर्चा करते हुए उन्होंने पुनः परिवार की बिखरी शाखा से मिलने-जुड़ने की कामना व्यक्त की। कहते हैं 'जहाँ चाह, वहाँ राह' उनकी यह चाह किसी निज हित के कारण नहीं स्नेह संबंध की उस टूटी कड़ी से जोड़ने की थी जिसे उनकी माताश्री प्रयास करने पर भी नहीं जोड़ सकीं थीं। शायद वे अपनी माँ की अधूरी इच्छा से पूरा करना चाह रही थीं। नियति से उनकी चाह के आगे झुकना पड़ा।

रहीम ने कहा है- 'रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय। टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ पड़ जाय।' महादेवी जी की जिजीविषा ने टूटे धागे से जोड़ ही दिया। उनके ये दोनों वक्तव्य मैंने पढ़े। मैं आजीविका से अभियंता तथा शासकीय सेवा में होने पर भी उन दिनों पत्रकारिता में डिप्लोमा कर रहा था। महादेवी जी द्वारा बताया विवरण परिवार से मेल खाता था। उत्सुकतावश मैंने परिवार के बुजुर्गों से चर्चा की। उन दिनों का अनुशासन... कहीं डांट पडी, कहीं से अधूरी जानकारी... अधिकांश अनभिज्ञ थे।

कुछ निराशा के बाद मैंने अपने परिवार का वंश-वृक्ष (शजरा) बनाया, इसमें महादेवी जी या उनके माता-पिता का नाम कहीं नहीं था। ऐसा लगा कि यह परिवार वह नहीं है जिसे महीयसी खोज रही हैं। अन्दर का पत्रकार कुलबुलाता रहा... खोजबीन जारी रही... एक दिन जितनी जानकारी मिली थी वह महीयसी से भेजते हुए निवेदन किया कि कुछ बड़े आपसे रिश्ता होने से स्वीकारते हैं पर नहीं जानते कि क्या नाता है? मुझे नहीं मालूम किस संबोधन से आपको पुकारूँ? आपके आव्हान पर जो जुटा सका भेज रहा हूँ।

आप ही कुछ बता सकें तो बताइये। मैं आपकी रचनायें पढ़कर बड़ा हुआ हूँ। इस बहाने ही सही आपका आशीर्वाद पाने के सौभाग्य से धन्य हूँ। लगभग एक सप्ताह बाद एक लिफाफे में प्रातः स्मरणीय महादेवी जी का ४ पृष्ठों का पत्र मिला। पत्र में मुझ पर आशीष बरसाते हुए उन्होंने लिखा था कि किसी समय कुछ विघ्न संतोषी सम्बन्धियों द्वारा पनपाये गए संपत्ति विवाद में एक खानदान की दो शाखाओं में ऐसी टूटन हुई कि वर्तमान पीढियाँ अपरिचित हो गयीं।

उनके पत्र से विदित हुआ कि उनके नाना स्व. खैराती लाल जी मेरे परबाबा स्व. सुन्दर लाल तहसीलदार के सगे छोटे भाई थे। पिताजी जिन चिन्जा बुआ की चर्चा करते थे उनका वास्तविक नाम हेमरानी देवी था और वे महादेवी जी की माता श्री थीं। हमारे कुल में काव्य साधन के प्रति लगाव हर पीढी में रहा पर प्रतिभाएँ अवसर के अभाव में घर-आँगन तक सिमट कर रह गयीं। सुन्दर लाल व खैराती लाल शिव भक्त थे। शिव भक्ति के स्तोत्र रचते-गाते। उनसे यह विरासत हेमरानी को मिली। बचपन में हेमरानी को भजन रचते-गाते देख-सुनकर महादेवी जी ने पहली कविता लिखी-

माँ के ठाकुर जी भोले हैं।

ठंडे पानी से नहलातीं।

गीला चन्दन उन्हें लगतीं।

उनका भोग हमें दे जातीं।

फिर भी कभी नहीं बोले हैं।

माँ के ठाकुर जी भोले हैं...

माँ से शिव-पार्वती, नर्मदा, सीता-राम, राधा-कृष्ण के भजन-आरती, तथा पर्वों पर बुन्देली गीत सुनकर बचपन से ही महादेवी जी को काव्य तथा हिन्दी के प्रति लगाव के संस्कार मिले। माँ की अपने मायके से बिछड़ने की पीडा अवचेतन में पोसे हुए महादेवी जी अंततः टूटी कड़ी से जुड़ सकीं। पूर्व जन्मों के पुण्य कर्मों का सुफल मुझे इस रूप में मिला कि मैं उनके असीम स्नेह का भाजन बना।

जो महान उसमें पले, अपनेपन की चाह।

क्षुद्र मनस जलता रहे, मन में रखकर डाह।

बिंदु सिन्धु से जा मिला:

कबीर ने लिखा है:

जिन खोजा तिन पाइयां, गहरे पानी पैठ।

जो बौरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ।

पूज्य बुआश्री से मिलने की उत्कंठा मुझे इलाहाबाद ले गयी। आवास पर पहुँचा तो ज्ञात हुआ कि वे बाबा विश्वनाथ की नगरी वाराणसी गयी हैं किसी को जानता था नहीं। निराश लौटने को हुआ कि एक कार को रुकते देख ठिठक गया। पलटकर देखा एक तरुणी वृद्धा को सहारा देकर कार से उतारने का जतन कर रही है।

मैं तत्क्षण कार के निकट पहुँचा तब तक वृद्धा जमीन पर पैर रखते हुए हाथ सहारे के लिए बढा रहीं थीं। पहले कभी न देखने पर भी मन ने कहा हो न हो यही बुआ श्री हैं। मैंने चरण स्पर्शकर उन्हें सहारा दिया। एक अजनबी युवा को निकट देख तरुणी संकुचाई, 'खुश रहो' कहते हुए बुआजी ने हाथ थामकर दृष्टि उठाई और पहचानने का यत्न करने लगीं कि कौन है?

तब तक घर से एक महिला और पुरुष आ गए थे। लम्बी यात्रा से लौटी श्रांत-क्लांत महीयसी को थामे अजनबी को देख कर उनके मन की उलझन स्वाभाविक थी। मैं परिचय दूँ इसके पहले ही वे बोलीं 'चलो, अन्दर चलो', मैंने कहा-'बुआजी! मैं संजीव' सुनते ही उनके चेहरे पर जिस चमक, हर्ष और उल्लास की झलक देखी वह अविस्मर्णीय है। उन्होंने भुजाओं में भरते हुए मस्तक चूमा। पूछा- 'कब आया?'

सब विस्मित कि यह कौन अजनबी इतने निकट आने की धृष्टता कर बैठा और उसे हटाया भी नहीं जा रहा। बुआ जी जैसे सबकी उलझन का आनंद ले रहीं हो, कुछ पल मौन रहकर बोलीं- 'ये संजीव है, मेरा भतीजा...जबलपुर से आया है।सबका अभिवादन किया।

उन्होंने सबका परिचय कराते हुए कहा 'ये मेरे बेटे की तरह रामजी, ये बहु, ये भतीजी आरती...चल अन्दर ले चल' मैं उन्हें थामे हुए घर में अन्दर ले आया। अन्दर कमरे में एक तख्त पर उजली सफ़ेद चादर बिछी थी, सिरहाने की ओर भगवान श्री कृष्ण की सुन्दर श्वेत बाल रूप की मूर्ति थी। बुआ जी बैठ गयीं। मुझे अपनी बगल में बैठा लिया, ऐसा लगा किसी तपस्विनी की शीतल वात्सल्यमयी छाया में हूँ।

तभी स्नेह सिक्त वाणी सुनी- 'बेटा! थक गया होगा, चाय-पानी कर आराम कर। फिर तुझसे बहुत सी बातें करना है। सामान कहाँ है?' तब तक आरती पानी ले आयी थी। मैंने पानी पिया, बताया चाय नहीं पीता, सुनकर कुछ विस्मित प्रसन्न हुईं, मेरे मन करने पर भी दूध पिलवाकर ही मानीं। मुझे चेत हुआ कि वे स्वयं सुदूर यात्रा कर थकी लौटी हैं। उन्होंने आरती को स्नान आदि की व्यस्वस्थ करने को कहा तो मैंने बताया कि मैं निवृत्त हो चुका हूँ। मैं धीरे से तखत के समीप बैठकर उनके पैर दबाने लगा... उन्होंने मना किया पर मैंने मना लिया कि वे थकी हैं कुछ आराम मिलेगा।

बुआ जी अपनी उत्कंठा को अधिक देर तक दबा नहीं सकीं। पूछा: कौन-कौन हैं घर-परिवार में? मैंने धीरे-धीरे सब जानकारी दी। मेरे मँझले ताऊ जी स्व. ज्वालाप्रसाद वर्मा ने स्व. द्वारका प्रसाद मिश्र, सेठ गोविन्द दास और व्यौहार राजेंद्र सिंह के साथ स्वतंत्रता सत्याग्रह में सक्रिय भूमिका निभायी, नानाजी राय बहादुर माता प्रसाद सिन्हा 'रईस', मैनपुरी ने ऑनरेरी मजिस्ट्रेट का पद व खिताब ठुकराकर बापू के आव्हान पर विदेशी वस्त्रों की होली जलाकर नेहरु जी के साथ त्रिपुरी कांग्रेस में भाग लिया और तभी इन दोनों की भेंट से मेरे पिताजी और माताजी का विवाह हुआ- यह सुनकर वे हँसी और बोलीं 'यह तो कहानी की तरह रोचक है।

मेरे एक फूफा जी १९३९ में हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय महामंत्री थे तथा कैप्टेन मुंजे व डॉ. हेडगेवार के साथ राम सेना व शिव सेना नामक सशस्त्र संगठनों के माध्यम से दंगों में अपहृत हन्दू युवतियों को मुक्तकर उनकी शुद्धि तथा सामाजिक स्वीकृति कराते थे । यह जानकर वे बोलीं- 'रास्ता कोई भी हो, भरत माता की सेवा ही असली बात है।' बुआ श्री ने १८५७ के स्वातंत्र्य समर में अपने पूर्वजों के योगदान और संघर्ष की चर्चा की। आरती ने उनसे स्नानकर भोजन करने का अनुरोध किया तो बोलीं- 'संजीव की थाली लगाकर यहीं ले आ, इसे अपने सामने ही खिलाऊँगी। बाद में नहा लूँगी।'

मैंने निवेदन किया कि वे स्नान कर लें तब साथ ही खा लेंगे तो बोलीं 'जब तक तुझे खिला न लूँ, पूजा में मन न लगेगा, चिंता रहेगी कि तूने कुछ नहीं खाया। उनके स्नेहपूर्ण आदेश का सम्मान करते हुए मुझे सामने ही बैठाया। एक रोटी अपने हाथों से खिलायी। भोजन के मध्य आरती से कह-कहकर सामग्री मंगाती रहीं। मेरा मन उनके स्नेह-सागर में अवगाहन कर तृप्त हो गया। उनके हाथों से घी लगी एक-एक रोटी अमृत जैसा स्वाद दे रही थी। फुल्के, दल, सब्जी, आचार, पापड़ जैसी सामान्यतः नित्य मिलनेवाली भोजन सामग्री में उस दिन जैसी मिठास फिर कभी नहीं मिली। पेट भर जाने पर भी आग्रह कर-कर के २ रोटी और खिलाईं, फिर मिठाई... बीच में लगातार बातें...फिर बोलीं- 'अब तुम आराम करो, नहाकर -पूजा करेगी।'

लगभग आधे घंटे में स्नान-ध्यान से निवृत्त होकर आयीं तो तखत पर विराजते ही मैं फिर समीप ही बैठ गया। उनके पैर दबाते-दबाते कितनी ही बातें हुईं...काश तब आज जैसे यंत्र होते तो वह सब अंकित कर लिया जा सकता। परिवार के बाद अब वे मेरे बारे में पूछ रहीं थीं...क्या-क्या पढ़ लिया?, क्या कर रहा हूँ?, किन विधाओं में लिखता हूँ?, कौन-कौन से कवि-लेखक तथा पुस्तकें पसंद हैं?, घर में किसकी क्या रूचि है?, उनकी कौन-कौन सी कृतियाँ मैंने पढीं हैं? कौन सी सबसे ज्यादा पसंद है? यामा देखे या नहीं?, कौनसा चित्र अधिक अच्छ लगा? प्रश्न ही प्रश्न... जैसे सब कुछ जान लेना चाहती हों, वह सब जो समय-चक्र ने इतने सालों तक नहीं जानने दिया।

मैं अनुभव कर सका कि उनके मन में कितना ममत्व है, अदेखे-अनजाने नातों के लिए। शायद मानव और महामानव के बीच की सीमा रेखा होती है कि महा मानव सब पर स्नेह अमृत बरसाते हैं। मेरे बहुत आग्रह पर आराम करने को तैयार हुईं... तू क्या करेगा?,ऊब तो नहीं जायेगा? आश्वस्त किया कि मैं भैया (डॉ.पाण्डेय) - भाभी से गप्प कर रहा हूँ, आप विश्राम कर लें।

कुछ देर बाद उठीं तो फिर बातचीत का सिलसिला चला। मुझसे पूछा- 'तू अपना उपनाम 'सलिल' क्यों लिखता है?' मैंने कभी गहराई से सोचा ही न था, क्या बताता? मौन देखकर बोलीं- 'सलिल माने पानी... पानी जिन्दगी के लिए जरूरी है...पर गंगा में हो या नाले में दोनों ही सलिल होते हैं। बहता पानी निर्मला... सो तो ठीक है पर... उनका आशय था कि नाम सबसे अच्छा हो तो काम भी अच्छा करने की प्रवृत्ति होगी। वे स्वयं नाम से ही नहीं वास्तव में भी महादेवी ही थीं।

बातचीत के बीच-बीच में वे आरती की प्रशंसा करतीं तो वह संकुचा जाती। मैं भी सुबह से देख रहा था कि वह कितनी ममता से बुआश्री की सेवा में जुटी थी। बुआजी डॉ. पाण्डेय व भाभी जी की भी बार-बार प्रशंसा करती रहीं। कुछ देर बाद कहा- 'तू क्या पूछना चाहता है पूछ न ? सुबह से मैं ही बोल रही हूँ। अब तू पूछ...जो मन चाहे...मैं तेरी माँ जैसी हूँ... माँ से कोई संकोच करता है? पूछ...' न कैसे अनुमान लगाया कि मेरे मन में कुछ जिज्ञासाएँ हैं।

पत्रकारिता में पढ़ते समय वरिष्ठ पत्रकार स्व. कालिकाप्रसाद दीक्षित 'कुसुमाकर' विभागाध्यक्ष थे। उनकी धारणा थी कि महादेवी जी ने निराला जी का अर्थ शोषण किया, मैं असहमति व्यक्त करता तो कहते 'तुम क्या जानो?' आज अवसर था लेकिन पूछूँ तो कैसे? बुआ जी के प्रोत्साहित करने पर मैंने कहा- 'निराला जी के बारे में कुछ बताइए।?'

'वे महाप्राण थे विषपायी...बुआजी के चेहरे पर प्रसन्नता के भाव आये, ऐसा लगा कि उनकी रूचि का प्रसंग है...कुछ क्षण आँखें मूँद कर जैसे उन पलों को जी रहीं हों जब निराला साथ थे। फिर बोलीं क्या कहूँ?...कितना कहूँ? ऐसा आदमी न पहले कभी हुआ... न आगे होगा... वो मानव नहीं महामानव थे...विषपायी थे। उनके बाद मेरी राखी सूनी हो गयी... उस एक ही पल में मैं समझ गया कि कुसुमाकर जी कि धारणा निराधार थी।

'निराला जी आम लोगों की तरह दुनियादारी से कोई मतलब नहीं रखते थे। प्रकाशक उनकी किताबें छापकर अमीर हो गए पर वे फकीर ही रह गये। एक बार हम लोगों ने बहुत कठिनाई से दुलारे लाल भार्गव से उन्हें रोयल्टी की राशि दिलवाई, वे मेरे पास छोड़कर जाने लगे मुश्किल से अपने साथ ले जाने को तैयार हुए, मैं खुश थी कि अब वे हमेशा रहनेवाले आर्थिक संकट से कुछ दिनों तक मुक्त रहेंगे।

कुछ दिनों बाद आये तो बोले कुछ रुपये चाहिए। मुझे अचरज हुआ कि इतने रुपये कहाँ गए? पूछा तो बोले उस दिन तुम्हारे पास से गया तो भूख से परेशान एक बुढिया को भीख मांगते देखा। जेब से एक नोट निकलकर उसके हाथ पर रखकर पूछा कि अब तो भीख नहीं मांगेगी। बुढिया बोली जब तक इनसे काम चलेगा नहीं मांगूगी। निराला जी ने एक गड्डी निकल कर उसके हाथों में रखकर पूछ अब कब तक भीख नहीं मांगेगी? बुढिया बोली 'बहुत दिनों तक।' निराला जी ने सब गड्डियाँ भिखारिन की झोली में डालकर पूछा- 'अब?' 'कभी नहीं' बुढिया बोली। निराला जी खाली हाथ घर चले गए।

जब खाने को कुछ न बचा तथा बनिए ने उधार देने से मना कर दिया तो मेरे पास आ गए थे। ऐसे थे भैया। कुछ देर रुकीं...शायद कुछ याद कर रहीं थी...फिर बोलीं एक बार कश्मीर में मेरा सम्मान कर पश्मीना की शाल उढाई गयी। मेरे लौटने की खबर पाकर भैया मिलाने आये। ठण्ड के दिनों में भी उघारे बदन, मैंने सब हाल बताया तथा शाल उन्हें उढा दी कि अब ठण्ड से बचे रहेंगे। कुछ दिन बाद ठण्ड से जड़ते हुए आये। मैंने पूछा शाल कहाँ है? पहले तो सर झुकाए चुप बैठे रहे। दोबारा पूछने पर बताया कि रास्ते में ठण्ड से पीड़ित किसी भिखारी को कांपते देख उसे उढा दी। बोल देखा है कोई दूसरा ऐसा अवढरदानी ? वाणी मौन थी और कान व्याकुल।

चर्चा...और चर्चा, प्रसंग से प्रसंग... निराला और नेहरु, निराला और पन्त, निराला और इलाचंद्र जोशी,, निराला और राजेंद्र प्रसाद, निराला और हिंदी, निराला और रामकृष्ण, निराला और आकाशवाणी, आदि...कभी कंठ रुद्ध हो जाता... कभी आँखें भर आतीं...कभी सर गर्व से उठ जाता... निराला और राखी की चर्चा करते हुए बताया कि निराला और इलाचंद्र जोशी में होड़ होती कि कौन पहले राखी बंधवाये? निराला राखी बाँधने के पहले रूपये मांगते फिर राखी बंधने पर वही दे देते क्योकि उनके पास कुछ होता ही नहीं था और खाली हाथ राखी बंधवाना उन्हें गवारा नहीं होता था।

स्मृतियों के महासागर में डूबती-तिरती बुआश्री का अगला पड़ाव था दद्दा और जिया... चिरगांव की राखी। दद्दा का संसद में कवितामय बजट भाषण...हिन्दी संबन्धी आन्दोलन... फिर प्रसाद और कामायनी की चर्चा। फिर दिनकर... फिर नन्द दुलारे वाजपेई... हजारी प्रसाद द्विवेदी... नवीन... सुमन... जवाहर लाल नेहरु... इंदिरा जी, द्वारका प्रसाद मिश्र... पत्रकार पी. डी. टंडन अनेक नाम... अनेक प्रसंग... अनंत कोष स्मृतियों का।

मैंने प्रसंग परिवर्तन के लिए कहा- 'कुछ अपने बारे में बताइए। 'क्या बताऊँ? अपने बारे में क्या कहूं? मैं तो अधूरी रह गयी हूँ उसके बिना...' मैं अवाक् था। किसकी कथा सुनने को मिलेगी? ...कौन है वह महाभाग? 'वह तो थी ही विद्रोहिणी... बचपन से ही... निर्भीक, निस्संकोच, वात्सल्यमयी, सेवाभावी, रूढी भंजक...फिर प्रारंभ हुआ सुभद्रा पुराण... स्कूल में भेंट... दोनों का कविता लिखना, चूडी बदलना... लक्ष्मण प्रसाद जी से भेंट... दोनों का विवाह... पर्दा प्रथा को तोड़ना... दुधमुंहे बच्चों को छोड़कर सत्याग्रह में भाग लेना-जेल यात्रा... फिर सुभद्रा जी के विधायक बनने में सेठ गोविन्द दास द्वारा बाधा... सरदार पटेल द्वारा समर्थन... गाँधी जी के अस्थि विसर्जन में सुभद्रा जी द्वारा झुग्गीवासियों को लेकर जाना...अंत में मोटर दुर्घटना में निधन... की चर्चा कर रो पडी...खुद को सम्हाला...आंसू पोंछे...पानी पिया...प्रकृतिस्थ हुईं...

'थक गया न ? जा आराम कर।'

'नहीं बुआजी! बहुत अच्छा लग रहा है...ऐसा अवसर फिर न जाने कब मिले?...तो क्या सुनना है अब?...इतनी कथा तो पंडित दक्षिणा लेकर भी नहीं कहता'...

'बुआ जी आपके कृष्ण जी!'...;

' मेरे नहीं... कृष्ण तो सबके हैं जो उन्हें जिस भाव से भज ले...उन्हें वही स्वीकार। तू न जानता होगा...एक बार पं. द्वारका प्रसाद और मोरार जी देसाई में प्रतिद्वंदिता हो गयी कि बड़ा कृष्ण-भक्त कौन है? पूरा प्रसंग सुनाया फिर बोलीं- भगवन! ऐसा भ्रम कभी न दे।'

अब भी मुझे आगे सुनने के लिए उत्सुक पाया तो बोलीं तू अभी तक नहीं थका?...पी. डी. टन्डन का नाम सुना है? एक बार साक्षात्कार लेने आया तो बोला आज बहुत खतरनाक सवाल पूछने आया हूँ। मैनें कहा पूछो तो बोला अपनी शादी के बारे में बताइये। मैनें कहा- 'बाप रे, यह तो आज तक किसी ने नहीं पूछा। क्या करेगा जानकर?'

बुआ जी बताइए न, मैं भी जानना चाहता हूँ।' -मेरे मुंह से निकला,

'तू भी कम शैतान नहीं है...चल सुन...फिर अपने बचपन...बाल विवाह...गाँधी जी व् बौद्ध धर्म के प्रभाव, दीक्षा के अनुभव, मोह भंग, प्रभावतीजी से मित्रता, जे. पी. के संस्मरण... अपने बाल विवाह के पति से भेंट... गृहस्थ जीवन के लिए आमंत्रण, बापू को दिया वचन गार्हस्थ से विराग आदि प्रसंग उन्होंने पूरी निस्संगता से सुनाये।

उनके निकट लगभग ६ घंटे किसी चलचित्र की भांति कब कटे पता ही न चला...मुझे घड़ी देखते पाया तो बोलीं- 'तू जायेगा ही? रुक नहीं सकता? तेरे साथ एक पूरा युग फिर से जी लिया मैंने।'

सबेरे वे अपनी नाराजगी जता चुकी थीं कि इतने कम समय में क्यों जा रहा हूँ?, रुकता क्यों नहीं? पर इस समय शांत थीं...उनका वह वात्सल्य...वह स्पर्श...वह स्नेह...अब तक रोमांचित कर देता है...बाद में ३-४ बार और बुआ जी का शुभाशीष पाया।

कभी ईश्वर मिले और वर माँगने को कहे तो मैं बुआ जी के साथ के वही पल फिर से जीना चाहूँगा।

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गुरुवार, 21 मई 2009

नवगीत प्लेटफॉर्म सा... संजीव वर्मा 'सलिल'

नवगीत
प्लेटफॉर्म सा...                                                                        
संजीव वर्मा 'सलिल'
*
प्लेटफॉर्म सा
फैला जीवन...
कभी मुखर है,
कभी मौन है।
कभी बताता,
कभी पूछता,
पंथ कौन है?
पथिक कौन है?
स्वच्छ कभी-
है मैला जीवन...
कभी माँगता,
कभी बाँटता।
पकड़-छुडाता
गिरा-उठाता।
बिन सिलाई का
थैला जीवन...
वेणु श्वास,
राधिका आस है।
कहीं तृप्ति है,
कहीं प्यास है।
तन मजनू,
मन लैला जीवन...
बहा पसीना,
भूखा सोये।
जग को हँसा ,
स्वयं छुप रोये।
नित सपनों की
फसलें बोए।
पनघट, बाखर,
बैला जीवन...
यही खुदा है,
यह बन्दा है।
अनसुलझा
गोरखधंधा है।
काँटे देख
नींद से जागे।
हूटर सुने,
छोड़ जां भागे।
रोजी का है
छैला जीवन...
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गुरुवार, 14 मई 2009

नवगीत: कहीं धूप क्यों?,

कहीं धूप क्यों?,
कहीं छाँव क्यों??...


सबमें तेरा
अंश समाया,
फ़िर क्यों
भरमाती है काया?

जब पाते तब-
खोते हैं क्यों?
जब खोते तब
पाते पाया।

अपने चलते
सतत दाँव क्यों?...

नीचे-ऊपर,
ऊपर-नीचे।
झूलें सब
तू डोरी खींचे,

कोई डरता,
कोई हँसता।
कोई रोये
अँखियाँ मींचे।

चंचल-घायल
हुए पाँव क्यों?...

तन पिंजरे में
मन बेगाना।
श्वास-आस का
ताना-बाना।

बुनता-गुनता
चुप सर धुनता।
तू परखे, दे
संकट नाना।

सूना पनघट,
मौन गाँव क्यों?...

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शनिवार, 25 अप्रैल 2009

nav geet: ज़रा-ज़र्रा बना सितारा...

पूनम से आमंत्रण पाकर,

ज़रा-ज़र्रा बना सितारा...

पैर थक रहे

तो थकने दो.

कदम रुक रहे

तो रुकने दो.

कभी हौसला

मत चुकने दो.

गिर-उठ-बढ़

ऊपर उठने दो.

एक दिवस देखे प्रयास यह

हर मंजिल ने विहँस दुलारा...

जितनी वक़्त

परीक्षा लेगा.

उतनी हमको

शिक्षा देगा.

नेता आकर

भिक्षा लेगा.

आम नागरिक

दीक्षा देगा.

देखेगा गणतंत्र हमारा.

सकल जगत ने उसे दुलारा...

असुर और सुर

यहीं लड़े थे.

कौरव-पांडव

यहीं अडे थे.

आतंकी मृत

यहीं पड़े थे.

दुश्मन के शव

यहीं गडे थे.

जिसने शिव को अंगीकारा.

उसी शिवा ने रिपुदल मारा...

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शनिवार, 18 अप्रैल 2009

नवगीत: तन गाड़ी को चला रहा मन

नव गीत

तन गाड़ी को

चला रहा मन

सौ-सौ कोडे मार;

स्वार्थ सेठ की

करना होगी

तुझे विवश बेगार...

आस-प्यास हैं

दो कारिंदे

निर्दय-निठुर

फेंकते फंदे

जाने-अनजाने

फंस जाते हम

हिम्मत को हार...

चाहा जागें

पर हम सोये

भूल-भुलैयां में

फंस खोये

मृगतृष्णा में

लालच ने

भटकाया

कर लाचार॥

नेह नर्मदा

नहा न पाये

कलुष-कुटिलता

बहा न पाये

काला-पीला

करो सिखाता

दुनिया का बाज़ार...

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गीत: सूरज ने भेजी है वसुधा को पाती

गीत

सूरज ने भेजी है

वसुधा को पाती

लाई है संदेसा

धूप गुनगुनाती...

सुत तेरा आदम

इंसान बन सके

हृदय-नयन में बसे

मधु गान बन सके

हाथ में ले हाथ,

गाये साथ मिल प्रभाती...

उषा की विमलता

निज आत्मा में धार

दुपहरी प्रखरता पर

करे जां निसार

संध्या हो आशा के

दीप टिमटिमाती...

निशा से नवेली

स्वप्नावली उधार

मांग श्वास संगिनी से

आस को संवार

अमावास दिवाली के

दीप हो जलाती...

आशा की किरण

करे मौन अर्चना

त्यागे पुरुषार्थ स्वार्थ

करे प्रार्थना

सुषमा शालीनता हों

साथ मुस्कुराती...

पुष्पाये पावस में

वंदना विनीता

सावन में साधना

गुंजाये दिव्य गीता

मोहिनी विभावरी

अंक में सुलाती...

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बुधवार, 8 अप्रैल 2009

नव गीत- कैसे देखें सपना?... आचार्य संजीव 'सलिल'

नव गीत-

आचार्य संजीव 'सलिल',

दिन भर मेहनत

आंतें खाली,

कैसे देखें सपना?...


दाने खोज,

खीजता चूहा।

बुझा हुआ है चूल्हा।

अरमां की

बरात सजी-

पर गुमा

सफलता दूल्हा।

कौन बताये

इस दुनिया का

कैसा बेढब नपना ?...


कौन जलाये

संझा-बाती

गयी माँजने

बर्तन।

दे उधार,

देखे उभार

कलमुंहा सेठ

ढकती तन।

नयन गडा

धरती में

काटे मौन

रास्ता अपना...


ग्वाल-बाल

पत्ते खेलें

बलदाऊ

चिलम चढाएं।

जेब काटता

कान्हा-राधा

छिप बीडी

सुलगाये।

पानी मिला

दूध में जसुमति

बिसरी माला जपना...


बैठ मुंडेरे

बोले कागा

झूठी आस

बंधाये।

निठुर न आया,

राह देखते

नैना हैं

पथराये।

ईंटों के

भट्टे में

मानुस बेबस

पड़ता खपना...


श्यामल 'मावस

उजली पूनम,

दोनों बदलें

करवट।

साँझ-उषा की

गैल ताकते

सूरज-चंदा

नटखट।

किसे सुनाएँ

व्यथा-कथा

घर की

घर में

चुप ढकना...

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शनिवार, 4 अप्रैल 2009

गीत: कोशिश का खुला रहे द्वार.... -आचार्य संजीव 'सलिल'

गीत

आचार्य संजीव 'सलिल'

संकट में,
हिम्मत मत हार.
कोशिश का
खुला रहे द्वार....

शूल बीन
फूल नित बिखेर.
हो न दीन,
कर नहीं अबेर.
तम को कर
सूरज बन पार....

माटी की
महक नहीं भूल.
सर न चढ़े
पैर दबी धुल.
मारों पर न
करना तू वार...

कल को दे
कल से अब जोड़.
नातों को
पल में मत तोड़.
कलकल कर
बहे 'सलिल'-धार...

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शुक्रवार, 27 मार्च 2009

गीत: दर्द तुम्हारा करुण कथा है.... -आचार्य संजीव 'सलिल'

गीत

दर्द तुम्हारा करुण कथा है,
पीर हमारी छद्म व्यथा है?
किस मानक को मान रहे हो?-
बैर अकलसे ठान रहे हो?...

सिर्फ़ तुम्हारी चोट चोट है?,
चोट हमारी तुम्हें खोट है।
हम ज्यों की त्यों चादर रखते-
तुम्हें सुहाए नगद नोट है।
जितना पाया- उतने खाली
गाथा व्यर्थ बखान रहे हो...

पाँच साल में शक्ल दिखायी।
लेकिन तुमको शर्म न आयी।
घर भर कर भी कर फैलाये-
जनगण मन को धता बतायी।
चोर, लुटेरे, डाकू, तस्कर-
बन सांसद अपमान रहे हो...

बोलो क्यों दे तुमको हम मत?
सत्य कह सको, है क्या हिम्मत?
राजमार्ग-महलों को तजकर-
चौपालों पर कर नित गम्मत।
यही तुम्हारी जड़ है जिसको-
'सलिल' नहीं पहचान रहे हो...

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मंगलवार, 17 मार्च 2009

गीत: श्वास गीत, आस-प्यास अंतरा -संजीव सलिल

गीत

श्वास गीत, आस-प्यास अंतरा।

सनातन है रास की परम्परा । ।

तन का नही, मन का मेल जिंदगी।

स्नेह-सलिल-स्नान ईश- बन्दगी।

नित सृजन ही सभ्यता औ' संस्कृति।

सृजन हेतु सृष्टि नित स्वयंवरा। ।

आदि-अंतहीन चक्र काल का।

सादि-सांत लेख मनुज-भाल का।

समर्पण घमंड, क्रोध, स्वार्थ का।

भावनाविहीन ज्ञान कोहरा । ।

राग-त्याग नहीं सत्य-साधना।

अनुराग औ' आसक्ति पूत भावना।

पुरातन है प्रकृति-पुरूष का मिलन।

निरावरण गगन, धारा दिगंबरा। ।

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