गुरुवार, 16 जुलाई 2009

गीत: अपना बिम्ब निहारो

दर्पण मत तोड़ो...

अपना बिम्ब निहारो दर्पण मत तोड़ो,
कहता है प्रतिबम्ब की दर्पण मत तोड़ो.
स्वयं सरह न पाओ, मन को बुरा लगे,
तो निज रूप संवारो,दर्पण मत तोड़ो....

शीश उठाकर चलो झुकाओ शीश नहीं.
खुद से बढ़कर और दूसरा ईश नहीं.
तुम्हीं परीक्षार्थी हो तुम्हीं परीक्षक हो,
खुद को खुदा बनाओ, दर्पण मत तोड़ो....

पथ पर पग रख दो तो मंजिल पग चूमे.
चलो झूम कर दिग्-दिगंत-वसुधा झूमे.
आदम हो इंसान बनोगे प्रण कर लो,
पंकिल चरण पखारो, दर्पण मत तोड़ो.

बांटो औरों में जो भी अमृतमय हो.
गरल कंठ में धारण कर लो निर्भय हो.
वरन मौत का कर जो जीवन पायें 'सलिल'.
इवन में उन्हें उतारो, दर्पण मत तोड़ो.

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3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत उत्प्रेरक उदबोधन गीत

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  2. आदरणीय सलिल साहब,
    आपकी तारीफ़ में कुछ भी कहना सूरज को दिया दिखाने के समान है। न जाने कितने दिनों से आपकी रचनाओं पर टिप्पणी का प्रयास कर रहा हूँ। आप आश्चर्य करेंगे आपका पेज नहीं खुलता था। ऐसे और भी कई ब्लाग रहे जो मेरे क्म्पयूटर में नहीं खुले। खुछ सेटिंग वैटिंग गड़बड़ हो गई थी। खै़र, बहुत दिनों बाद आपसे मुलाक़ात बड़ी सुखद रही। एक आध दिन साथ बैठना है जल्द और यह बिम्बो-दर्पण ज़रूर सुनाइएगा ।
    आपके मुरीद

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  3. सलिल जी

    दर्पण मत तोड़ो, एक सशक्‍त रचना है। दर्पण ही वो माध्‍यम है जिससे हम स्‍वयं का चेहरा देख पाते हैं, यदि यह नहीं होता तो हमें मालूम भी नहीं होता कि हम दिखते कैसे हैं? बधाई। मेरे नवगीत पर आपकी टिप्‍पणी की प्रतीक्षा है।

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