शुक्रवार, 21 अगस्त 2009
गीत: कलम गीत की फसलें बोती
फसलें बोती...
शब्द सिपाही का
संबल बन,
नेह नर्मदा
या चम्बल बन,
सलिल तरंगें
अग-जग धोतीं...
परम्परा पिंजरे
में सिसके,
तोड़-छोड़
जाने में हिचके,
सहे पीर पर
धीर न खोती...
मन कोमल पर
तन कठोर है,
सांझ सुरमई
विमल भोर है।
स्वप्न सीप में,
सृजती मोती...
कभी खास है,
कभी आम है।
नाम अनेकों
पर अनाम है।
अरमानों की
मुखर संगोती...
फूल-शूल
पाषाण-धूल को।
शिखर-गगन को,
भूमि-मूल को
चुप अपने
कन्धों पर ढोती...
*****
गीत: अपनेपन का अर्पित...
अपनेपन का अर्पित,
अपनों को मान-पान...
गिरते हम, उठते हम।
रुकते हम, चलते हम।
बाधा से तनिक नहीं
डरते हम। थमते हम.
पैर जमा धरती
पर- छू लेंगे आसमान...
हार नहीं मानेंगे
तम् से रार ठानेंगे।
अक्षौहिणी तुम ले लो,
मात्र कृष्ण मांगेंगे।
पाञ्चजन्य फूंकेंगे,
होंगे हम भासमान...
कर्म-कथा कहते हैं,
मर्म-व्यथा सुनते हैं।
पर्वत के पत्थर से-
रेवा सम बहते हैं।
लहर-लहर, भंवर-भंवर
ऊगेंगे शत विहान...
दस दिश में गूंजेंगे,
नए मूल्य पूजेंगे।
संकट के समाधान
युक्ति लगा बूझेंगे।
मेहनती-प्रयासी ही
भाई-बंधु, खानदान...
ऊषा की लाली हम,
दोपहरी प्याली हम।
संध्या की मुसकाहट,
निशा नवल काली हम।
दस दिश में गूंजेंगे-
सरगम-सुर, ताल-तान...
मन्दिर में शंख-नाद
मस्जिद में हम अजान।
कंकर हम, शंकर हम,
विधि-हरि-हर अक्षर हम।
अजर-अमर, अटल-अगम।
कदमों के हम निशान...
शेष नाग फुफकारें।
तूफां बन हुंकारें।
मधुवन के मधुकर हम,
कलियों पर गुन्जारें।
अमिय-गरल हैं हमको-
सत्य कहें प्रिय सामान...
आ जाओ, लगो गले।
मिल पायें भले गले।
दगा दगा को देन हम-
हर विपदा हाथ मले-
हृदयों के कमल खिले
मन का मन करे मान...
*****
रविवार, 16 अगस्त 2009
नवगीत: मगरमचछ सरपंच... आचार्य संजीव् 'सलिल'
मगरमचछ सरपंच
मछलियाँ घेरे में
फंसे कबूतर आज
बाज के फेरे में...
सोनचिरैया विकल
न कोयल कूक रही
हिरनी नाहर देख
न भागी, मूक रही
जुड़े पाप ग्रह सभी
कुण्डली मेरे में...
गोली अमरीकी
बोली अंगरेजी है
ऊपर चढ़ क्यों
तोडी स्वयं नसेनी है?
सन्नाटा छाया
जनतंत्री डेरे में...
हँसिया फसलें
अपने घर में भरता है
घोड़ा-माली
हरी घास ख़ुद चरता है
शोले सुलगे हैं
कपास के डेरे में...
*****
सोमवार, 10 अगस्त 2009
स्वाधीनता दिवस पर विशेष रचना: हिंदी है. --'सलिल'
आचार्य संजीव 'सलिल'
जो कुछ भी इस देश में है, सारा का सारा हिंदी है.
हर हिंदी भारत माँ के माथे की उज्जवल बिंदी है....
मणिपुरी, कथकली, भरतनाट्यम, कुचपुडी, गरबा अपना है.
लेजिम, भंगड़ा, राई, डांडिया हर नूपुर का सपना है.
गंगा, यमुना, कावेरी, नर्मदा, चनाब, सोन, चम्बल,
ब्रम्हपुत्र, झेलम, रावी अठखेली करती हैं प्रति पल.
लहर-लहर जयगान गुंजाये, हिंद में है और हिंदी है.
हर हिंदी भारत माँ के माथे की उज्जवल बिंदी है....
मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, गिरजा सबमें प्रभु एक समान.
प्यार लुटाओ जितना, उतना पाओ औरों से सम्मान.
स्नेह-सलिल में नित्य नहाकर, निर्माणों के दीप जलाकर.
बाधा, संकट, संघर्षों को गले लगाओ नित मुस्काकर.
पवन, वन्हि, जल, थल, नभ पावन, कण-कण तीरथ, हिंदी है.
हर हिंदी भारत माँ के माथे की उज्जवल बिंदी है....
जै-जैवन्ती, भीमपलासी, मालकौंस, ठुमरी, गांधार.
गजल, गीत, कविता, छंदों से छलक रहा है प्यार अपार.
अरावली, सतपुडा, हिमालय, मैकल, विन्ध्य, उत्तुंग शिखर.
ठहरे-ठहरे गाँव हमारे, आपाधापी लिए शहर.
कुटी, महल, अँगना, चौबारा, हर घर-द्वारा हिंदी है.
हर हिंदी भारत माँ के माथे की उज्जवल बिंदी है....
सरसों, मका, बाजरा, चाँवल, गेहूँ, अरहर, मूँग, चना.
झुका किसी का मस्तक नीचे, 'सलिल' किसी का शीश तना.
कीर्तन, प्रेयर, सबद, प्रार्थना, बाईबिल, गीता, ग्रंथ, कुरान.
गौतम, गाँधी, नानक, अकबर, महावीर, शिव, राम महान.
रास कृष्ण का, तांडव शिव का, लास्य-हास्य सब हिंदी है.
हर हिंदी भारत माँ के माथे की उज्जवल बिंदी है....
ट्राम्बे, भाखरा, भेल, भिलाई, हरिकोटा, पोकरण रतन.
आर्यभट्ट, एपल, रोहिणी के पीछे अगणित छिपे जतन.
शिवा, प्रताप, सुभाष, भगत, रैदास कबीरा, मीरा, सूर.
तुलसी. चिश्ती, नामदेव, रामानुज लाये खुदाई नूर.
रमण, रवींद्र, विनोबा, नेहरु, जयप्रकाश भी हिंदी है.
हर हिंदी भारत माँ के माथे की उज्जवल बिंदी है....
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स्वाधीनता दिवस पर विशेष रचना: स्वतंत्र विश्व के स्वतंत्र वासियों को शत नमन. -संजीव 'सलिल'
आचार्य संजीव 'सलिल'
स्वतंत्र विश्व के स्वतंत्र वासियों को शत नमन.
स्वतंत्र ही रहे फिजा, स्वतंत्र ही रहे चमन.
स्वतंत्र हों, ये लक्ष्य ले, जो बढे कदम-कदम.
स्वतंत्र नहीं, देख जिनके दिल दुखे, थीं आँख नम.
स्वतंत्र दीप-शिख जलाने जिनने सर कटा दिए.
स्वतंत्रता-प्रकाश पाने खुद के घर जला दिए.
स्वतंत्रता के दीवानों को मौत भी थी जिंदगी.
स्वतंत्रता ही धर्म-कर्म, दीन-ईमां बंदगी.
स्वतंत्र मौत जिंदगी, गुलाम जिंदगी मरण.
स्वतंत्र स्वप्न सत्य हों, गुलाम सत्य विस्मरण.
स्वतंत्र आज हम हैं जिनके त्याग औ' बलिदान से.
स्वतंत्र जी रहे उठाये सर जहां में शान से.
स्वतंत्रता दिवस उन्हें नमन करो, नमन करो.
स्वतंत्रता पे जां लुटा के सार्थक जनम करो.
स्वतंत्रता का अर्थ नहीं आपसी टकराव है.
स्वतंत्र हैं सभी तभी जब आपसी लगाव है.
स्वतंत्र भारती उतारो आज मिल के आरती.
स्वतंत्रता की नर्मदा परम पवित्र तारती.
स्वतंत्र देश-वेश, भाषा-भाव भी पवित्र हैं.
स्वतंत्र मरण ही स्वतंत्र जिंदगी का मंत्र है.
जय जवान! जय किसान!!
जय विज्ञानं! देश महान!!
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स्वाधीनता दिवस पर विशेष आव्हान गीत :टूट जाओ मत झुकना साथी. -संजीव 'सलिल'
आचार्य संजीव 'सलिल'
टूट जाओ मत झुकना साथी.
बीच राह मत रुकना साथी.
एक-एक जुड़ शत-सहस्त्र हो-
थककर कभी न चूकना साथी....
मंजिल अपनी पाना साथी.
राह भूल मत जाना साथी.
राष्ट्र जिंदगी है हम सबकी-
बन इसका दीवाना साथी...
बहुत सहा, मत सहना साथी.
मेहनत अपना गहना साथी.
ऐक्यभाव की नेह-नर्मदा-
बन तरंग संग बहना साथी....
दीपकवत जल जाना साथी.
मरकर जीवन पाना साथी.
युग आया अब करो-मरो का-
गूँजे यही तराना साथी....
सब को साथ उठाना साथी.
कोई नहीं बेगाना साथी.
कंकर-कंकर से शंकर रच-
भू पर स्वर्ग बसाना साथी...
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गीत: श्रम के सुमन चढायेंगे
श्रम के सुमन चढायेंगे.
आचार्य संजीव 'सलिल'
राष्ट्र देव के श्री चरणों में,
श्रम के सुमन चढायेंगे.
संघर्षों के पथ पग धर,
निर्माणों पर बलि जायेंगे.....
हम से देश, देश से हम हैं.
मेहनत ही अपना परचम है.
मन्दिर, मस्जिद, गिरजा भूलो
एक देव युग-युग से श्रम है.
नेह नर्मदा नित्य नहाकर
जीवन सफल बनायेंगे...
सार-सार को छाँट-छाँटकर,
पाषाणों को काट-काटकर.
अर्जन- अर्चन में सब भागी-
श्रेय सभी लें बाँट-बाँटकर.
समरसता का मूलमंत्र हम
अग-जग में गुंजायेंगे...
माटी से मीनार गढ़ेंगे.
मंजिल तक सब साथ बढ़ेंगे.
बलिदानी-बलिपंथी हैं हम-
एक नहीं शत शीश चढेंगे.
हर कीमत देंगे, लेकिन पग
पीछे नहीं हटायेंगे.....
'मावस में बन दीप जलेंगे.
साथ समय के सदा चलेंगे.
कर्म करेंगे निरासक्त हो,
कभी न अपने दिवस ढलेंगे.
सबसे-सबके लिए-सभी का
ध्येय मार्ग अपनाएंगे....
अधिकारों का तेल डालकर,
कर्तव्यों के दीप बालकर.
रौशन कर दें सारी दुनिया,
''सलिल'' कदम रख हर सम्हालकर.
कर्मयोग के साधक हम सब
कर्मव्रती कहलायेंगे...
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शुक्रवार, 7 अगस्त 2009
गीत: हम गिर-उठकर खड़े हुए हैं
हम गिर-उठकर
खड़े हुए हैं।
जो न गिरे
वे पड़े हुए हैं...
सूरत-सूरत
सुंदर मूरत,
कहीं न कुछ भी
बिना जरूरत।
पल-प्रति पल
जो जिए बदलकर,
जुड़े टूटकर-
जमे पिघलकर।
जो न महकते
सड़े हुए हैं...
कंकर-कंकर
देखे शंकर।
शिव-शव दोनों
ही प्रलयंकर।
मन्दिर-मन्दिर
बजाते घंटे;
पचा प्रसादी-
पलते पंडे।
तकदीरों से
बड़े हुए हैं...
ये भी, वे भी
दोनों कच्चे,
ख़ुद को बड़ा
समझते बच्चे।
सीख न पाते
किंतु सिखाते,
पुष्प वृक्ष से
झडे हुए हैं...
*****
रविवार, 2 अगस्त 2009
गीत: दीप-वर्तिका सदृश जलेंगे
गीत
> दीपवर्तिका
सदृश जलेंगे
आपद-विपदा
विहँस सहेंगे...
हैं लघु कण
यह सत्य जानते,
पर विराट से
समर ठानते।
पचा न पायें
आप हलाहल,
धार कंठ में-
हम उबारते।
शिवता-सुंदरता
के पथ पर-
सत का कर
गह नित्य बढ़ेंगे...
कहीं न परिमल
हर दल दलदल।
भ्रमर-दंश से
दंशित शतदल।
सलिल-धार
अनवरत प्रवाहित।
शब्द अमरकंटक
से प्रति पल।
लोक नर्मदा
नीति वर्मदा
कार्य शर्मदा
सतत करेंगे...
अजर-अमर हैं
हम अक्षर हैं।
नाद-ताल हैं
सरगम-स्वर हैं।
हम अनादि हैं,
हम अनंत हैं।
सादि-सांत हम
क्षण-भंगुर हैं॥
सच कहते हैं
सब जग सुन ले,
मौत वरेंगे पर न मरेंगे,
*****
शनिवार, 1 अगस्त 2009
गीत: अपने-सपने कर नीलाम
गीत
अपने सपने
कर नीलाम
औरों के कुछ
आयें काम...
तजें अयोध्या
अपने हित की
गहें राह चुप
सबके हित की
लोक हितों की
कैकेयी अनुकूल
न अब हो वाम...
लोक नीति की
रामदुलारी
परित्यक्ता
जनमत की मारी
वैश्वीकरण
रजक मतिहीन
बने- बिगाडे काम...
जनमत-
बेपेंदी का लोटा
सत्य-समझ का
हरदम टोटा
मन न देखता
देख रहा
है 'सलिल' चमकता चाम...
*****
गुरुवार, 30 जुलाई 2009
गीत: चुप न रहें निज स्वर में गायें
गीत
चुप न रहें
निज स्वर में गायें;
निविड़ तिमिर में
दीप जलाएं...
फिक्र नहीं जो
जग ने टोका
बाधा दी
हर पग पर रोका
झेल प्रबल
तूफां का झोंका
मुश्किल में
सब मिल मुस्काएं...
कौन किसी का
सदा सगा है?
अपनेपन ने
छला-ठगा है
झूठा नाता
नेह पगा है
सत्य न यह
पल भर बिसराएँ...
कलकल निर्झेर
बन बहना है
सुख-दुःख सम
चुप रह सहना है
नहीं किसी से
कुछ कहना है
रुकें न
मंजिल पायें...
*****
शुक्रवार, 24 जुलाई 2009
शोक गीत : समय कीमत कर न पाया... -आचार्य संजीव 'सलिल'
-आचार्य संजीव 'सलिल'
(प्रसिद्ध कवि-कथाकार-प्रकाशक, स्व. डॉ. (प्रो.) दिनेश खरे, विभागाध्यक्ष सिविल इंजीनियरिंग, शासकीय इंजीनियरिंग महाविद्यालय जबलपुर, सचिव इंडियन जियोटेक्नीकल सोसायटी जबलपुर चैप्टर के असामयिक निधन पर )
नर नहीं,
नर-रत्न थे तुम,
समय कीमत
कर न पाया...
***
विरल थी
प्रतिभा तुम्हारी.
ज्ञान के थे
तुम पुजारी.
समस्याएँ
बूझते थे.
रूढियों से
जूझते थे.
देव ने
क्षमताएँ अनुपम
देख क्या
असमय बुलाया?...
***
नाथ थे तुम
'निशा' के पर
शशि नहीं,
'दिनेश' भास्वर.
कोशिशों में
गूँजता था
लग्न-निष्ठा
वेणु का स्वर.
यांत्रिकी-साहित्य-सेवा
दिग्-दिगन्तों
यश कमाया...
***
''शीघ्र आऊंगा''
गए-कह.
कहो तो,
हो तुम कहाँ रह?
तुम्हारे बिन
ह्रदय रोता
नयन से
आँसू रहे बह.
दूर 'अतिमा' से हुए-
'कौसुन्न' को भी
है भुलाया...
***
प्राण थे
'दिनमान' के तुम.
'विनय' के
अभिमान थे तुम.
'सुशीला' की
मृदुल ममता,
स्वप्न थे
अरमान थे तुम.
दिखाए-
सपने सलोने
कहाँ जाकर,
क्यों भुलाया?...
***
सीख कुछ
तुमसे सकें हम.
बाँट पायें ख़ुशी,
सह गम.
ज्ञान दें,
नव पीढियों को.
शान दें
कुछ सीढियों को.
देव से
जो जन्म पाया,
दीप बन
सार्थक बनाया.
***
नर नहीं,
नर-रत्न थे तुम,
'सलिल' कीमत
कर न पाया...
***
गुरुवार, 23 जुलाई 2009
नवगीत: अभिनव प्रयोग गुलाम हैं.... -संजीव 'सलिल'
आचार्य संजीव 'सलिल'
तुम
गुलाम देश में
आजाद हो जिए
और हम
आजाद देश में
गुलाम हैं....
तुम निडर थे
हम डरे हैं,
अपने भाई से.
समर्पित तुम,
दूर हैं हम
अपनी माई से.
साल भर
भूले तुम्हें पर
एक दिन 'सलिल'
सर झुकाए बन गए
विनत सलाम हैं...
तुम वचन औ'
कर्म को कर
एक थे जिए.
हमने घूँट
जन्म से ही
भेद के पिए.
बात या
बेबात भी
आपस में
नित लड़े.
एकता?
माँ की कसम
हमको हराम है...
आम आदमी
के लिए, तुम
लड़े-मरे.
स्वार्थ हित
नेता हमारे
आज हैं खड़े.
सत्ता साध्य
बन गयी,
जन-देश
गौड़ है.
रो रही कलम
कि उपेक्षित
कलाम है...
तुम
गुलाम देश में
आजाद हो जिए
'सलिल' हम
आजाद देश में
गुलाम हैं....
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गुरुवार, 16 जुलाई 2009
गीत: अपना बिम्ब निहारो
अपना बिम्ब निहारो दर्पण मत तोड़ो,
कहता है प्रतिबम्ब की दर्पण मत तोड़ो.
स्वयं सरह न पाओ, मन को बुरा लगे,
तो निज रूप संवारो,दर्पण मत तोड़ो....
शीश उठाकर चलो झुकाओ शीश नहीं.
खुद से बढ़कर और दूसरा ईश नहीं.
तुम्हीं परीक्षार्थी हो तुम्हीं परीक्षक हो,
खुद को खुदा बनाओ, दर्पण मत तोड़ो....
पथ पर पग रख दो तो मंजिल पग चूमे.
चलो झूम कर दिग्-दिगंत-वसुधा झूमे.
आदम हो इंसान बनोगे प्रण कर लो,
पंकिल चरण पखारो, दर्पण मत तोड़ो.
बांटो औरों में जो भी अमृतमय हो.
गरल कंठ में धारण कर लो निर्भय हो.
वरन मौत का कर जो जीवन पायें 'सलिल'.
इवन में उन्हें उतारो, दर्पण मत तोड़ो.
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शनिवार, 11 जुलाई 2009
गीत -संजीव 'सलिल' भाग्य निज पल-पल सराहूं
भाग्य निज पल-पल सराहूं,
जीत तुमसे, मीत हारूं.
अंक में सर धर तुम्हारे,
एक टक तुमको निहारूं...
नयन उन्मीलित, अधर कम्पित,
कहें अनकही गाथा.
तप्त अधरों की छुअन ने,
किया मन को सरगमाथा.
दीप-शिख बन मैं प्रिये!
नीराजना तेरी उतारूं...
हुआ किंशुक-कुसुम सा तन,
मदिर महुआ मन हुआ है.
विदेहित है देह त्रिभुवन,
मन मुखर काकातुआ है.
अछूते प्रतिबिम्ब की,
अंजुरी अनूठी विहंस वारूँ...
बांह में ले बांह, पूरी
चाह कर ले, दाह तेरी.
थाह पाकर भी न पाये,
तपे शीतल छांह तेरी.
विरह का हर पल युगों सा,
गुजारा, उसको बिसारूँ...
बजे नूपुर, खनक कंगना,
कहे छूटा आज अंगना.
देहरी तज देह री! रंग जा,
पिया को आज रंग ना.
हुआ फागुन, सरस सावन,
पी कहाँ, पी कंह? पुकारूं...
पंचशर साधे निहत्थे पर,
कुसुम आयुध चला, चल.
थाम लूँ न फिसल जाए,
हाथ से यह मनचला पल.
चांदनी अनुगामिनी बन.
चाँद वसुधा पर उतारूं...