गुरुवार, 23 जुलाई 2009

नवगीत: अभिनव प्रयोग गुलाम हैं.... -संजीव 'सलिल'

अमर शहीद चन्द्र शेखर आजाद जयंती पर विशेष नवगीत:

आचार्य संजीव 'सलिल'

तुम
गुलाम देश में
आजाद हो जिए
और हम
आजाद देश में
गुलाम हैं....

तुम निडर थे
हम डरे हैं,
अपने भाई से.
समर्पित तुम,
दूर हैं हम
अपनी माई से.
साल भर
भूले तुम्हें पर
एक दिन 'सलिल'
सर झुकाए बन गए
विनत सलाम हैं...

तुम वचन औ'
कर्म को कर
एक थे जिए.
हमने घूँट
जन्म से ही
भेद के पिए.
बात या
बेबात भी
आपस में
नित लड़े.
एकता?
माँ की कसम
हमको हराम है...

आम आदमी
के लिए, तुम
लड़े-मरे.
स्वार्थ हित
नेता हमारे
आज हैं खड़े.
सत्ता साध्य
बन गयी,
जन-देश
गौड़ है.
रो रही कलम
कि उपेक्षित
कलाम है...

तुम
गुलाम देश में
आजाद हो जिए
'सलिल' हम
आजाद देश में
गुलाम हैं....
*****************

4 टिप्‍पणियां:

  1. सलिल जी अद्भुत रचना है आपकी...सत्य को दर्शाती...वाह...नमन है आपकी लेखनी को...
    नीरज

    उत्तर देंहटाएं
  2. आचार्य सलिल को मेरा शत -शत नमन ,आपके द्वारा प्राप्त टिप्पणी ने मेरा सम्मान और हौसला बढाया --इसी प्रकार प्रेरित करें इस सद्भावना के साथ --
    आपकी कविता में आज की सच्चाई व दशा का सटीक वर्णन है |
    तुम निडर थे -हम डरे हैं अपने भाई से ,
    तुम वचन और कर्म कर
    एक थे जिए ,
    हमने घूँट जन्म से ही ,
    भेद के पिए -
    इन पंक्तियों ने मन को छू लिया ,यही तो हमारी त्रासदी है कि हम जानकार भी कुछ नहीं कर पाते |भावाभिव्यक्ति बहुत सुन्दर है |बधाई ....

    उत्तर देंहटाएं
  3. ’एकता’

    माँ की कसम

    हमको हराम है..


    -वाह! अद्भुत!!बहुत सुन्दर ..बधाई.

    उत्तर देंहटाएं
  4. क्या बात कही आपने......

    आपकी कलम को नमन......सत्य से सामना कराती अद्वितीय रचना ....पढ़वाने के लिए आभार...

    उत्तर देंहटाएं

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