मंगलवार, 26 अगस्त 2008

गीत: आओ, लड़ें चुनाव

लोकतंत्र के
बनें मसीहा

आओ, लड़ें चुनाव।
बेचें अपनी
निष्ठाओं को,

रोज बढाएं भाव...

जय-जयकार
करें ख़ुद अपनी

सदा अलग हो
कथनी-करनी।

श्वेत वसन
काला अंतर्मन
स्वार्थ-सिद्धि की
माला जपनी।

अधरों पर
मुस्कान छद्म हो,
कभी न
खाएं ताव...


जन-गण को
ठेंगा दिखलायें।

जन-मत को
तत्काल भुलाएँ।
सिद्धांतों को
बेच-खरीदें-
जन-मन को
हर रोज लुभाएँ।

दिन दूने औ'
रात चौगुने
जीत बढाएं भाव...

चमचे पालें,
भीड़ जुटाएं।

अमन-चैन को
आग लगाएं।
जुलुस निकालें,
पत्थर फेंकें,
अख़बारों में
चित्र छ्पायें।

नकली आँसू,
असली माला
दोनों अपना दांव...

जाति, क्षेत्र,
भाषा के झगडे।

मजहब के
नुस्खे हैं तगडे
बंदर-बाँट
नीति अपनाएं

कभी न सुलझें
झंझट-झगडे।

कोशिश अपनी
हर घर में हो,
मन-मन में अलगाव...


जाए भाड़ में
देश बिचारा

हमको तो
सत्ता-पद प्यारा

जंगल काटें,
पर्वत खोदें।

बेच-करें
निज वारा-न्यारा।
मुंह में राम
बगल में छूरी
अपना सही स्वभाव...

*******

6 टिप्‍पणियां:

  1. दोहे और गीत ..भावपूर्ण व काव्यगत सौंदर्य से अभिपूरित .., १५ दिनो में २० पोस्टिंग ..इसी गति से कीजीये ..छा जायेंगे . शुभकामनायें

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  2. जन-गण को
    ठेंगा दिखलायें।
    जन-मत को
    तत्काल भुलाएँ।
    सिद्धांतों को
    बेच-खरीदें-
    जन-मन को
    हर रोज लुभाएँ।
    दिन दूने औ'
    रात चौगुने
    जीत बढाएं भाव...
    aap bahut achha likhte hain. badhayi sweekaren.

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  3. बहुत अच्छा लिखते हैं आप |
    शुद्ध शैली में |

    मेरे तरफ़ से आपकी रचनाओं को नमन |

    -- अवनीश तिवारी

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  4. मेरी पोस्ट पर आपकी अनोखी और सुंदर कवितामयी टिपण्णी हेतु बहुत बहुत आभार. संयोग पर आपार हर्ष हो रहा है कि आपकी टिपण्णी के माध्यम से आपके ब्लॉग पर आने का सुअवसर मिला. पता नही कैसे यह आज तक नजरों से नही गुजरा था.मेरा सौभाग्य है कि इतनी सुंदर सशक्त उच्चस्तरीय रचनाएँ पढने का सौभाग्य मिला.
    मैंने इसे अपने पठनीय ब्लोगों में सहेज लिया है.आभार.

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