शनिवार, 17 जनवरी 2009

गीत सलिला

समय - समय की बात

कभी तीर पर, कभी धार में,
समय - समय की बात...

बिन मजबूरी करें अहर्निश,
चुप रहकर बेगार,
सूर्य-चन्द्र जैसा जन-गण तो-
क्यों सुधरे सरकार?
यहाँ पूर्णिमा-वहाँ अमावस
दोनों की है मात...

गति, यति, पिंगल, लय बिन
कविता बिना गंध का फूल।
नियम व्याकरण की पंखुडियाँ,
सिर्फ़ शब्द हैं चुभते शूल।
सत-शिव-सुंदर मूल्य समाहित
रचना नव्य प्रभात ...

जनमत भुला मांगते जन-मत,
नेता बने भिखारी।
रिश्वत लेते रहे नगद पर-
वादे करें उधारी।
नेता, अफसर, व्यापारी ने
नष्ट किए ज़ज्बात...

नहीं सभ्यता और संस्कृति के
प्रति किंचित प्यार।
देश सनातन हाय! बन
गयाअब विशाल बाज़ार।
आग लगाये जो उसको ही
पाल रहे हैं तात...

कोई किसी का मीत नहीं,
यह कैसी बेढब रीत?
कागा के स्वर में गाती क्यों
कोयल बेसुर गीत?
महाराष्ट्र का राज राष्ट्र से-
'सलिल' करे क्यों घात?...

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1 टिप्पणी:

छोटी सी ये दुनिया...

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