रविवार, 5 फ़रवरी 2012

दोहा सलिला: संग मुहावरा-२ --संजीव 'सलिल'

दोहा सलिला:
दोहा संग मुहावरा-२
संजीव 'सलिल'
*
'अंकुश रखना' सीख ले, मतदाता यदि आज.
नेता-अफसर करेंगे, जल्दी उनके काज.१२.
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'अपने मुँह बनते मियाँ मिट्ठू' नाहक आप.
'बात बने' जब गैर भी 'करें नाम का जाप'.१३.
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खुद ही अपने पैर पर, रहे कुल्हाडी मार.
जब छलते हैं किसी को, जतला झूठा प्यार.१४.
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'अपना गला फँसा लिया', कर उन पर विश्वास.
जो न सगे निज बाप के, था न तनिक आभास.१५.
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'अंधे को दीपक दिखा', बारें नाहक तेल.
हाथ पकड़ पथ दें दिखा, तभी हो सके मेल.१६. 
*
कर 'अंगद के पैर' सी, कोशिश- ले परिणाम.
व्यर्थ नहीं करना सलिल, 'आधे मन से काम'.१७.
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नहीं 'अँगूठा दिखाना', अपनों से हो क्लेश.
'ठेंगे पर मत मारना', बढ़ जायेगा द्वेष.१८.
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'घोड़े दौड़ा अक्ल के', रहे पहेली बूझ.
'अकलमंद की दुम बने', उत्तर सका न सूझ.१९.
*
'अपना सा मुँह रह गया', हारे आम चुनाव. 
'कर अरण्य रोदन' रहे, 'सलिल' न 'देना भाव'.२०.
*
'आँखों का तारा हुआ', नटखट कान्हा ढीठ.
खाये माखन चुराकर, गोप 'उतारें दीठ'.२१. 
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