गुरुवार, 29 जुलाई 2010

गीत: हिन्दी ममतामय मैया है... संजीव 'सलिल

गीत:

हिन्दी ममतामय मैया है...


संजीव 'सलिल'

*






















*
हिंदी ममतामय मैया है
मत इससे खिलवाड़ करो...
*
सूर कबीर रहीम देव
तुलसी
से बेटों की मैया.
खुसरो बरदाई मीरां
जगनिक
खेले इसकी कैंया.

घाघ भड्डरी ईसुरी गिरिधर
जगन्नाथ भूषण
मतिमान.
विश्वनाथ श्री क्षेमचंद्र
जयदेव वृन्द
लय-रस की खान.

जायसी रायप्रवीण बिहारी
सेनापति
बन लाड़ करो.
हिंदी ममतामय मैया है
मत इससे खिलवाड़ करो...
*
बिम्ब प्रतीक व्याकरण पिंगल
क्षर-अक्षर रसलीन रहो.
कर्ताकारक कर्म क्रिया उपयुक्त
न रख क्यों दीन रहो?

रसनिधि
शब्द-शब्द चुनकर
बुनकर अभिनव ताना-बाना.
बन जाओ रसखान काव्य की 
गगरी निश-दिन छलकाना.

तत्सम-तद्भव लगे डिठौना

किन्तु न तिल को ताड़ करो.
हिंदी ममतामय मैया है
मत इससे खिलवाड़ करो...
*

जिस ध्वनि का जैसा उच्चारण

वैसा लिखना हिन्दी है.
जैसा लिखना वैसा पढ़ना
वही समझना हिंदी है.

मौन न रहता कोई अक्षर,

गिरता कोई हर्फ़ नहीं.
एक वर्ण के दो उच्चारण
दो उच्चारो- वर्ण नहीं.

करो 'सलिल' पौधों का रोपण,

अब मत रोपा झाड़ करो.
हिंदी ममतामय मैया है
मत इससे खिलवाड़ करो...
*



Acharya Sanjiv Salil

http://divyanarmada.blogspot.com

1 टिप्पणी:

  1. वाह हिंदी के सम्मान में बहुत ही सुंदर कविता ।

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