मंगलवार, 3 नवंबर 2009

स्मृति गीत: संजीव 'सलिल'

स्मृति गीत:

संजीव 'सलिल'

सृजन विरासत

तुमसे पाई...

*

अलस सवेरे

उठते ही तुम,

बिन आलस्य

काम में जुटतीं.

सिगडी, सनसी,

चिमटा, चमचा

चौके में

वाद्यों सी बजतीं.

देर हुई तो

हमें जगाने

टेर-टेर

आवाज़ लगाई.

सृजन विरासत

तुमसे पाई...

*

जेल निरीक्षण

कर आते थे,

नित सूरज

उगने के पहले.

तव पाबंदी,

श्रम, कर्मठता

से अपराधी

रहते दहले.

निज निर्मित

व्यक्तित्व, सफलता

पाकर तुमने

सहज पचाई.

सृजन विरासत

तुमसे पाई...

*

माँ!-पापा!

संकट के संबल

गए छोड़कर

हमें अकेला.

विधि-विधान ने

हाय! रख दिया

है झिंझोड़कर

विकट झमेला.

तुम बिन

हर त्यौहार अधूरा,

खुशी पराई.

सृजन विरासत

तुमसे पाई...

*

यह सूनापन

भी हमको

जीना ही होगा

गए मुसाफिर.

अमिय-गरल

समभावी हो

पीना ही होगा

कल की खातिर.

अब न

शीश पर छाँव,

धूप-बरखा मंडराई.

सृजन विरासत

तुमसे पाई...

*

वे क्षर थे,

पर अक्षर मूल्यों

को जीते थे.

हमने देखा.

कभी न पाया

ह्रदय-हाथ

पल भर रीते थे

युग ने लेखा.

सुधियों का

संबल दे

प्रति पल राह दिखाई..

सृजन विरासत

तुमसे पाई...


*

3 टिप्‍पणियां:

  1. Udan Tashtari ने कहा…
    बहुत सुन्दर गीत!!

    November 4, 2009 6:15 AM

    उत्तर देंहटाएं
  2. शरद कोकास said...
    संजीव जी आज बहुत दिनों पश्चात इधर आना हुआ । यह गीत सुन्दर लगा । और कैसे है आप ? रमेश जी से हमारी मुलाकात होती रहती है आपको याद करते है ।

    November 3, 2009 10:32 PM

    उत्तर देंहटाएं
  3. शरद कोकास ने कहा…
    पिता के एक पुत्र के चरित्र निर्माण मे योगदान का बखान करती यह सुन्दर कविता है । बधाई।

    November 4, 2009 12:20 AM

    उत्तर देंहटाएं

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