शुक्रवार, 18 सितंबर 2009

नवगीत: लोकतंत्र के शहंशाह की जय...

नवगीत:

लोकतंत्र के
शहंशाह की जय...
*
राजे-प्यादे
कभी हुए थे.
निज सुख में
नित लीन मुए थे.
करवट बदले समय
मिटे सब-
तनिक नहीं संशय.
कोपतंत्र के
शहंशाह की जय....
*
महाकाल ने
करवट बदली.
गायब असली,
आये नकली.
सिक्के खरे
नहीं हैं बाकि-
खोटे हैं निर्भय.
लोभतंत्र के
शहंशाह की जय...
*
जन-मत कुचल
माँगते जन-मत.
मन-मथ,तन-मथ
नाचें मन्मथ.
लोभ, हवस,
स्वार्थ-सुख हावी
करुनाकर निर्दय.
शोकतंत्र के
शहंशाह की जय....

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4 टिप्‍पणियां:

  1. लाजवाब रचना है आज के लोक तंत्र की सटीक अभिव्यक्ति शुभकामनायें

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  2. बहुत सही व सटिक चित्रण किया है आपने इस रचना के द्वार। बहुत-बहुत बधाई.......

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  3. सलिल साहब, इतनी ख़ूबसूरती से यह बात सिर्फ़ आप ही कह सकते हैं। ईद मुबारक़।

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